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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

८३

जीवधर्मबोध

( १९९१ )

प्राण मनो विज्ञान जो तीनी । स्वप्न स्वरूप तिन्है कहि दीनी ॥ पुनि अनंदमय कोष जो आही । रूप सुषुप्ती कहिये ताही ॥ जाग्रत रजगुन रूप कहीजै । सतगुन रूप स्वप्न कहिदीजै ॥ तमगुन रूप सुषुप्ति कहावै । देहमन्त्री गुन सुभाव बतावै ॥ पुण्यदया वांछा रजगुनकह । पुन्य पिछार विषाद तमो यह ॥ वांछा रहित सतोगुन जानी । त्रिगुन कर्म नानाविधि मानी ॥ जिव अज्ञानते आपको कहई । पुण्यपाप सब मेरो अहई ॥ ज्ञानी गुनन सुभाव सो जाने । अज्ञानी अपनो करि माने ॥ यहि बिधि जेते तनके कर्मा । सो सब मन इंद्रिके धर्मा ॥ पाँचो तत्त्व त्रिगुनते भयऊ । गुन आज्ञा शक्तिसे कहेऊ ॥ चित्तसे अज्ञान शक्ती होई । मन अरु चित्त भेद नहिं कोई ॥ सर्वे कर्म जो जगके माहीं । मनहीं केर पसारा आहीं ॥ मन माया तिरगुन न्यौहारा । जक्तमाह भ्रम जाल पसारा ॥

अथ योग और भोग दोनों मिथ्या वर्णन

दोहा—षट्दल चक्रको भेदके, योगी पौन चढ़ाय । दल सहस्रके कमलमें, निर्विकल्प हो जाय ॥ हो विदेह पद अमर लह, विद्यामें ठहराय । भे निरद्वन्द्व न कल्पना, आपमें आप समाय ॥

चौपाई

जिमि योगी तिमि भोगी देखे । कमल भेद दोनों यक लेखे ॥ द्वन्द्वदीब दोनोंको खेला । इत नरनारी उत गुर चेला ॥ योगी उरध पौन चढ़ावै । भोगी अधषानी ले आवै ॥ नादके बल योगी अविनाशी । विंदके चल भोगी सुखराशी ॥ नारिपुरुष जब भा संयोगा । दोनों मिले भोग सुख भोगा ॥ माथेसे जब माथ जुरेऊ । सिरवर कमलते बिंद उतरेऊ ॥

( १९९२ )

बोधसागर

८४

नेत्रसे नेत्र जुटे जिहि बारा । द्वैदल कमल भेदि चलु पारा ॥ मुखसे मुख जेहि औसर चूमा । तबही बिंद अधो दिस घूमा ॥ तब घोडश दल कमल बधाना । द्वादशदलपर पुनि ठहराना ॥ अनहद चक्रते बिंद उतारा । मणिपूरकपर आसन धारा ॥ मणिपूरकते हेटको हेरा । स्वाधिष्ठान चक्र कर डेरा ॥ नारिपुरुष मिलि द्वन्द मचाया । स्वाधिष्ठान उतरि जल आया ॥ टिका अधारचक्र जब पानी । सह विकल्प भोगी तब जाना ॥ ज्ञान पुत्र योगा जब पायौ । अमर भयौ फिर गर्भ न आयौ ॥ योगी हृदये जबलों ज्ञाना । तबलों ताको अमर बखाना ॥ ज्ञान लोप होवे जेहि काला । तब योगीको हो जंजाला ॥ ज्ञानदृष्टि करि योगी जाना । मेंहंमि जगमें पसराना ॥ अज्ञ पुत्र तिमि योगी जाया । वंशवृद्धि जगमें फैलाया ॥ भोगी अमर भयौ तेहि बारा । तासु वंश जगमाह पसारा ॥ जबलों वंश जक्तमें ताका । भोगा अमर भयौ परिपाका ॥ तासु वंश जब हो संसारा । भोगी मृतक होय तेहि बारा ॥ आपै आप सकल जगमाही । अज्ञदृष्टि करि जा तन नाहीं ॥ योगी विद्या द्वारे जाना । भोगी अविद्याते अज्ञाना ॥ योग भोग दोनों हैं झूठे । संत सुजान दोहूते हूठे ॥ योगअरु भोग ब्रह्म जिव माया । नादर्शिद जो कछु उपजाया ॥ सो सब भर्म एक नहिं सांचा । सांचे सतगुरुको यह वाचा ॥ भर्मै नाद अरु भर्मै बिंदू । भर्महि तुर्क अरु भर्मै हिंदू ॥ भर्म निमाज भर्मही रोजा । भर्महि ते सब ईश्वर खोजा ॥ भर्महि देऊल भर्महि देवा । भर्महि पूजा भर्महि सेवा ॥ भर्महि धरती भर्म अकाशा । भर्महिको यह सकल प्रकाशा ॥ भर्मको रचित सकल संसारा । टूटै भर्म होय भव पारा ॥

इति योग और भोग मिथ्या

८५

जीवधमबाध

( १९९२ )

अथ स्वसंवेदमते अष्टांगयोगवर्णन सत्यकबीरवचन अष्टांगयोगकी रमैनी अविगति लीला अगम अपारा । धरती धरचौ सत्य औतारा ॥ अविगति लीला अगम अलेखा । अवरन बरन रूप नहिरेखा ॥ जाकी गति सुर मुनि नहीं पाई । अविगतिकीगतिवरनि न जाई ॥ शेष सहस्रमुख निशिदिन गावे । अस्तुति करति पार नहीं पावे ॥ वेद जो कोट सहस्र पुन गावे । अविगति गतिवरनी नहीं जावे ॥

साखी-अविगतिकी बेगति है, मन बुध चितते दूर ।

आपमेटि सतगुरु मिलै, पावै दरस हजूर ॥

रमैनी

योगी बहुत योग जो करई । कृपा योगते नहीं निस्तरई ॥ फिर फिर आवै फिर-फिर जाई । कर्महि कर्म बहुत अरु झाई ॥ है निष्कर्म नाम जो ध्यावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥ कमही कम बंधावहु भारा । कमही कम अटका संसारा ॥ देह कर्म जो लीन उठाई । मनको कर्म छुटै नहीं भाई ॥ जब लगिमनकी कर्म न खोवै । तबलगि मननिर्मल नहीं होवै ॥ जब मनकी किरिया मिटि जाई । तब हरि मिलै सहजमे आई ॥

साखी-तन किरियाको छोड़िके, मन किरिया रुचिराख ॥

कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निजु भाष ॥

रमैनी

तनकी करनी देहु बहाई । मनकी करनी सत्य मिलाई ॥ मनकी किरिया सत्य जो कोई । ताहि समान और नहीं कोई ॥ सांख्य योग करनी है सारा । जेहिते उतरे भव जल पारा ॥ सत्य क्रियाते ज्ञानी भैऊ । सत्यक्रिया साहिब मिलगैऊ ॥ सत्य क्रिया सतपुरुष हि ध्यावै । सत्कक्रिया सतनाम मिलावै ॥

साखी-सत्यक्रिया निर्वान है, तन मन ते सो भिन्न ।

मन पौना टढकै गहै, सत्यनाम निजु चिन्ह ॥

नं. ११ बोधसागर - ८

( १९९४ )

बोधसागर

८६

चौपाई

अब मैं सांख्ययोग जो कहऊँ । योग अष्टांगको लक्षण लहऊ ॥ एकएकके चार चार लक्षण । जो जानै सो होय विचक्षण ॥ येतो कहिये लक्षण बतीसा । योग अष्टांगमें एकै दीसा ॥ अष्टांग योग सांख्य जो जाने । अरु लक्षण बत्तिस पहिचाने ॥

समौ-तेई भवसागर तरे, याकरनी निजु सार ।

सत्यकिया सतसे गहै, सत्यनाम आधार ॥

रमैनी

प्रथमै योग ज्ञान है भाई । ताहिते सुखव परमपद पाई ॥ निरालंब आलंब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥ कर्म भरम तजि साहेब जाने । भली बुरी कछु चित्त नहि आने ॥ निरवासनिक वास नहि कोई । जंगल वस्ती एक सो होई ॥ है निरवैर रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥

समौ-एकनामको जानिके, दूजा देय बहाय ।

तीरथ व्रत जप तप नहिं, आतम ताव समाय ॥

रमैनी

दूजा योग विचार विचारे । निरमोही है आप विचारे ॥ है निवैँ रहै जगमाहीं । जगके सुखमें लगै नाहीं ॥ मातु पिता सुत नारि न भावै । काम क्रोध मद लोभ भुलावै ॥ है निष्कंट शब्दसे लागे । अनहद सुने आतमा जागे ॥ देही छोड़ि विदेह समाना । हंसा पावै पद निर्बाना ॥

समौ-जो कछु करे विचारके, रह पुन्यपापते न्यार ।

कहै कबीर नामहि जाने, जाय पुरुष दरवार ॥

रमैनी

तीजे योग विवेक कहावै । बिन विवेक कोइ पार न पावै ॥

८७

जीवधर्मबोध

(१९९५)

जाको समाधान मन होई। भली बुरी कहि जावै कोई ॥ समदरशी समज्ञान विचारे। सबघट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति गहे सो नाम समाना। और सकल जग मिथ्या जाना ॥ जाके शांति होइ घट नाही। कोइ कछु कहै कोध मन नाही ॥

रमैनी

चौथा योग शील कहि दीना। विना शील साहेब नहिं चीन्हा ॥ निर्मल सोचे सोचि विचारे। शुचि रुचि दया धर्म उर धारे ॥ मनको संयम करै जो ज्ञानी। पांचों पकरि एक घर आनी ॥ सत्य शब्द भावै संसारा। सत्यहिसे उतरे भवपारा ॥ होय औतारा सत्य बखाने। भावै बुरा भला कोइ माने ॥

समौ-शीलक्षमा जब ऊपजै, अलख दृष्टि जब होय।

विना शील पहुँचे नहीं, लाखो कथै जो कोय ॥

रमैनी

पच्वां योग सन्तोष बखानी। बिन संतोष बुझे अज्ञानी ॥ मानै नहीं रंक औ राजा। है अमान नहिं काहुते काजा ॥ नर्क स्वर्ग बाँछै नहिं कोई। होय अबच्छक साहेब सोई ॥ मन अस्थिर करि प्रेम उपजावै। अनहद शब्द सुने चितलावै ॥

समौ-निरमल शब्द प्रकाशकर, रह सुखसेज समय।

सत्य नाम सन्तोष बिन, सत्यलोक नहिं जाय ॥

रमैनी

छठै योग रहै निरवैरा। जाते जगते होय न वैरा ॥ सब घट भीतर एक करि जानी। होय सुदृष्टि परम परमानी ॥ सुख दाई सबहिनको भावै। जलस्वरूप है अग्नि बुझावै ॥ शीतल है सबहीको भावै। समता हो रमताको पावै ॥

समौ-कंचन काँचि है एकसम, दुष्ट मित्र सम एक।

दूजा भाव न जानहीं, एक नामकी टेक ॥

( १९९६ )

बोधसागर

८८

रमैनी

सतवां योग सहज है मीता । सहज भावसे यम से जीता ॥ एक विचार प्रेम उपजावै । पांचों इन्द्री सहज समावै ॥ निरलोभी है लोभ भुलावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥ निस्संशीक होय जो कोई । संशय काल रहै नहिं कोई ॥ है निलैप कतहु नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागे ॥

समौ-सब जग जूठा जानिके, सत्य नाम है सार ॥ सहजे सहज प्रकट भया, सतगुरु शब्द सँभार ॥

रमैनी

अठयौ योग शून्य है नीका । एकनाम आगे जग लागे फीका ॥ श्रुत्रहीते सब जग उपराजा । श्रुत्रहीते शब्द जो बाजा ॥ सहज श्रुत्र जो लावै कोई । अलखको लखै आपही सोई ॥ सहज शून्य जो ध्यान लगावै । भवजल तरत वार नहिं लावै ॥ सुरति शब्द ले सहज समावै । सहज समाधि परमपद पावै ॥

समौ-ज्ञानविचार विवेकते, शील संतोष समाय । नाम गहों निर्भय रहो, सत्यलोक सहजे जाय ॥

इति अष्टांग योगकी रमैनी

अथ ज्ञानपरीक्षा चार

निरालंब । निर्भर्म । निर्वासनिक । निरस्वादी ॥ १ ॥

विचारपरीक्षा चार

निरमोही । निरबंध । निःशंक । निर्वान ॥ २ ॥

विवेकपरीक्षा चार

सर्वगी । सावधान । सुचेत । सारग्राही ॥ ३ ॥

शीलपरीक्षा चार

शुची । संयमी । श्रोता । वक्ता ॥ ४ ॥

८९

जीवधर्मबोध

( १९९७ )

संतोषपरीक्षा चार

अयाची । अवांछी । अमानी । अस्थिर ॥ ५ ॥

निर्वैरपरीक्षा चार

सुहृद । समता । शीतल । सुखदाई ॥ ६ ॥

सहजपरीक्षा चार

निष्प्रपंच । निस्तुरंग । निर्द्रढ़ । निलैष ॥ ७ ॥

शून्यपरीक्षा चार

लौलक्ष । धीरज । ध्यान । समाधि ॥ ८ ॥

समौ-कबीर बतीसो जब उगवै, तैतीसो छपि जाय ।

कहै कबीर सुन गोरख, आवागमन नसाय ॥

इति अष्टांगयोग स्वसंवेदमतै

अथ सातज्ञानभूमिकावर्णन

दोहा-सीषता विचार समानता, सिसरातो सुखपंत ।

बहुरि पदार्थ अभावनी, तुरिया ज्ञान गहंत ॥

चौपाई

प्रथम सीषता भूमि जो कहिये । शुभइच्छाते शुभ गति लहिये ॥ ज्ञानचाह सच्छास्त्र उचारन । सत्संगत अपकर्म निवारन ॥ द्वितीय विचार भूमिका सोई । दूँढ सुसंग सुविद्या जोई ॥ तृतीय समाता है वैरागा । तन मनते विषयनको त्यागा ॥ चौथे भूमि सिस्तांत कहावै । गेह नेह तजि अलग रहावै ॥ हो निवृत्त सब विषय बिहाई । हरिपद प्रीति न और सोहाई ॥ पंचई भूमि सुषुप्ति कहीजै । ईश्वरलीन भर्म भय छीजै ॥ छठे पदारथ अभावनी भाषा । प्रभुपद लीन न सुचितन राखा ॥ ऐसो ध्यान नाह अनुरागा । बिना जमाये सो नहि जागा ॥ सतई भूमि कहावै तुरिया । जहां पहुंचपुनिचितनहिफुरिया ॥

( १९९८ )

बोधसागर

९०

ऐसो ईश्वरमें लौं लागे । कोऊ जगावै तऊ न जागे ॥

इति ज्ञानभूमिका

अथ सात अज्ञानभूमिकावर्णन

दोहा-अशुची है जागृतो, महा जागृती गत ।

जागृत स्वप्ना स्वप्न, जागृत पुनि स्वप्ना सुषुप्त ॥

चौपाई

प्रथम अशुचि जागत अज्ञाना । तन सुख चाह सदा अलसाना ॥ दुतिये जागृत जाहि बखाना । अहं कुलीन श्रेष्ठ गुनज्ञाना ॥ तृतिये महाजागत यौं भाषे । दोहू लोक पौरुष हम राखे ॥ ऐसो मैं गुणज्ञान निधाना । मेरे वशमें अहै फलाना ॥ चौथे जागृत स्वप्ना यांचा । जो मैं कहों सुनो सब सांचा ॥ पंचम स्वप्ना जागत भाषा । देखे स्वप्न सुरति सब राखा ॥ छठयें स्वप्न भूमिका कहई । देखे स्वप्न सुरति नहिं रहई ॥ सप्तम भूमि सुषोपति होई । सुधिवुधिरहित जीव जब सोई ॥ सातो भूमि ज्ञान उर धारो । पुनि सातो अज्ञान विचारो ॥ यक पौरीपर दूजी पौरी । होय सघनता अगिली ठौरी ॥ प्रभुमें शुभ इच्छा जब होई । सच्छास्त्रन अवलोकै सोई ॥ सच्छास्त्रनको रस भल चीखी । ताकी बुद्धि भई तब तीखी ॥ सच्छास्त्रन पठि भयौ जो पक्का । तब तो दुतिय मूगिका तक्का ॥ दुतिय भूमिका आहि विचारा । तब सत्संगतको पग धारा ॥ सत्संगत जब जीव टटोले । तब ग्रन्थनकी ग्रन्थी खोले ॥ जबलों नहिं सत्संगत जूटे । ग्रन्थनकी ग्रन्थी नहिं छूटे ॥ दुतिय भूमिमें जब जिव पागा । तब तृतियेमें हो वैरागा ॥ हठ बैराग होय जिहि काला । चौथ भूमिकामें पग डाला ॥ जब चौथीमें हठ जिव भैऊ । तब पंचम हरिपद गहिलैऊ ॥

९१

जीवधमबाध

( १९९९ )

जब हरिपद तजि और न भावै । तब छटवों भूमिकामें जावै ॥ भयौ लीन जब छटवों भूमी । तब तेहि माह रह्यो सो रूमी ॥ जबलों लागि प्रीति अति गाढ़े । सतई भूमिमें भे तब ठाढ़े ॥ सतई भूमिमें जब जिव होई । तब नहिं तनहिंमें नहिं कोई ॥ छूटि गयौ तब देहको नाता । तब नहिं जक्त न जगतकी बाता ॥ विद्या और अविद्या दोई । भर्मरूप जानो सब सोई ॥ दोनों ब्रह्मा केर कल्पना । सो ब्रह्मा आवै भ्रम स्वप्ना ॥ ब्रह्मा आप जो भो भ्रमरूपा । ताकी कृत सकल भ्रमकृपा ॥

इति

अथ जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति मिथ्यावर्णन--चौपाई ब्रह्मा विष्णु महेश्वर टेरे । जीवनमुक्त न माह बडेरे ॥ सो तिहु भवसागरके कारन । बारबार तिनको बसुधारन ॥ व्यास वशिष्ठ पराशर बादा । दशरथ जनको ध्रुव प्रहलादा ॥ सो सब जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनितनधरि जगमें आवै ॥ सत्यकवीर वचन परमाना । ध्रुव प्रहलाद श्रेष्ठ करि जाना ॥ साठि हजार वर्ष ध्रुव भोगकर । प्रहलाद भोग चौकरी बह्तर ॥ इतने बड़ा भक्त नहिं कोऊ । आवागौन युक्त रह सोऊ ॥ जेते जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनि तनधरि जगमें आवै ॥ प्रलय विदेहमुक्त सब होई । उत्पतिमें तनधर सब सोई ॥ आवै जाय सो मुक्त न मानो । दोनों मुक्ति भर्म करि जानो ॥

सत्यकवीर वचन-शब्द

भर्मसेवा भर्मपूजा, भर्म जपतप ध्यान । भर्मकरिकरि भर्मबंधा, नहीं सब पहिचान ॥ भर्म इंद्री करी निग्रह, भर्म गुफा में वास ।

( २००० )

बोधसागर

९२

भर्म तो तहाँ लोकहो जहाँ, जीवनमुक्तको वास ॥ कहो जी तुम आये कहते, जाहुगे किस ठाँव । औरको उपदेश देतहो, आप समुझत नाह ॥ जानबेको कहा कहिये, कहेको पतियाय । कहै कबीर अनंतरधुनि उपजै, सहज शून्य समाय ॥

चौपाई

लोमस ऋषि आदिक मुनि नाना । जिनको हंस कबीर बखाना ॥ कोटिन उत्पति प्रलय जो होई । कबहुँ गर्भ नहिं आवै सोई ॥ मुक्तस्वरूप संत कह तिनको । आवागौनसूत्र नहिं जिनको ॥ सारशब्द सतगुरुको लहेऊ । जन्ममरणको संशय दहेऊ ॥ जक्तमाह जेते हैं कर्मा । सो सब मिथ्या जिवको भर्मा ॥ झूठ सत्य दोउ एकसम आहीं । यहि संसार सार कछु नाहीं ॥ उत्तम करनी जिवको करना । यद्यपि नहीं सार कछु बरना ॥ गर्भते शिशु बाहर हो जबसे । कर्मकरन लागे सो तबसे ॥ कर्मक्रिया सब तबते जागे । हाथपांव शिशु फेकन लागे ॥ हाथपांव मारन ते जाहीं । नफा होय कछु शिशुको नाहीं ॥ शिशुहि भलो कर पगमारनहै । बिन कर पग फेके दुखतन है ॥ हो बाल जब अधिक सयाना । माटी धूल खेल अरु काना ॥ ताहु कर्म नफा नहिं पावै । तऊ खेलमें घौस बितावै ॥ कर्म करत पहुंचै तरुणार्ई । लाभ कर्मते तब कछु पाई ॥ सोऊ लाभ नफा कछु नाहीं । सर्व कर्म मिथ्या है ताहीं ॥ आदि अवस्था यथा निहारी । कर्म करत बीते बयसारी ॥ कर्म करनकी बानि न होई । तौ निश्चय जिव जाय बिगोई ॥ भलो कर्म करिये तेहि काजा । जाते शुभगतिको सज साजा ॥

९३

जीवधर्मबोध

(२००१)

वेद कि बिधिते जो कोइ ध्यावै । जीवन्मुक्तकी पदवी पावै ॥ स्वसंवेद विधि कर्म जो करिये । पाय अमरपद बहुरी न मरिये ॥

सत्यकबीर वचन-शब्दहेली

हेली तीरथ जाय बलाय । हरदम परवी नहाय ॥ तीरथ कोट अनंत है रे गंग यमुन जहैं दोय । मध्य सरस्वती वहत है नहाये निरमल होय ॥ ब्रह्म नयके घाटमें हो आगे शिवको लिंग । ताहुँपै दक्षिना दीजिये रे बहे सहसमुख गंग ॥ आगे कलाली कि हाट है रे चोखा फूल चुबंत ॥ बिन सतगुरु पावै नहीं कोई साधूजन पीवंत ॥ शीश उतारि धरनि धरैरे ऊपर धरि ले पाय । ब्रह्म नयके घाट मेरे याविधि परवी नहाय ॥ ऋग यजुर साम अथर्वना रे चार वेदको ज्ञान । उनकी कहो उहो कौनगति बांधे गांठि पखान ॥ चारवेदको पिता है रे स्वसंवेद संगीत । साहिब कबीर जूके मोकदिमे रे अविगति ब्रह्म अतीत ॥

इति जीवनमुक्तमिथ्या

अथ वर्णाश्रममिथ्यावर्णन-चौपाई

वर्णाश्रम सब मिथ्या जाना । नरकृत सो अज्ञानते माना ॥ पूर्व कर्म बिन यहि तनमाहीं । केते विप्र शुद्ध हैं जाहीं ॥ केते शुद्ध विप्र सो भैऊ । मातु पिता नहीं ब्राह्मण रहेऊ ॥ जो कोई वर्णाश्रमते अटका । निश्चय सो सत्पन्थसे भटका ॥ मल अरु मूत्र कि देही जोई । ताको ब्राह्मण कहे न कोई ॥ ज्ञान द्वार जो ब्राह्मण भैऊ । वर्णाश्रम ताके नहीं रहेऊ ॥

( २००२ )

बोधसागर

९४

राजा पंडित मिसके दोई । वर्णाश्रम थापे सब सोई ॥ जिते जीव वर्णाश्रम बंधा । उत्तम विद्यासे सो अंधा ॥ उत्तम धर्म गहे नहीं पावै । वर्णाश्रम तिनको अटकावै ॥ लहै कबहुँ नहीं ज्ञान कि घाटी । जिनको वर्णाश्रमकी टाटी ॥ प्रथम जैन मते मैं भाषा । तीन वर्ण कुल करते राखा ॥ भरथने ब्राह्मण वर्ण थपाई । चार वर्णकुल यहि भांति कहाई ॥ चक्रवर्तिपद भरथ जो पायौ । दान देनको प्रजा बुलायौ ॥ प्रजा परीक्षाको मनलाया । बीच राहमें जल ढरकाया ॥ जलमय धरती हो जेहि ठाई । जीव असंख्य तहां प्रकटाई ॥ दान लेनको प्रजा जो चाले । दयावंत पथ गह्यो निराले ॥ जहां कीच तहँ पग नहीं दैऊ । भरथ भूप तेहि न्यारा कियऊ ॥ ब्रह्मचीन्हि जिन दाया पालो । कीच बीचमें सो नहीं चालो ॥ ब्राह्मण तिनको नाम उचारा । सबपर श्रेष्ठ धर्मसो धारा ॥ अजयपाल कनउजको राजा । रचे ताहिमें यज्ञ समाजा ॥ सातसौ वर्षके ऊपर भैऊ । लखब्राह्मण सो नेवति बोलैऊ ॥ येतो ब्राह्मण सो नहीं पाये । तब नरेश अस हुकम लगाये ॥ जो कोइ विप्र चिह्ने आवै । द्विजसम आदर दछिना पावै ॥ वर्ण विवेक न कीने राजा । जो आये तेहि यज्ञ समाजा ॥ भूप सबहि को द्विजकरि माना । विप्रतुल्य दे आदर दाना ॥ केते विप्र बने तेहि बेला । निज गल माह जनेऊ मेला ॥ नृप बुलाय सेनपति बंगाला । ताहूकी कहिये अस चाला ॥ कनउजसे द्विज पंच बोलाई । बंगालेमें सो चलिजाई ॥ ब्राह्मण पांच अरु कायथ पांचा । पहुँच जहां महीपति जांचा ॥ तिन्है प्रतिष्ठा दीन सो राजा । बस बंगाले सहित समाजा ॥ तिनको वंश पसारा कीना । भित्र भित्र पदवी सो लीना ॥

९५

जीवधर्मबोध

( २००३ )

उत्तम मध्यम तिनमें कीने । जैसो कर्म जासु लखि लीने ॥ ब्राह्मण तिनमें तीन बडोरे । चतुरजी वणुजी मुकुरजी टेरे ॥ कायथ श्रेष्ठ कहे मुनि तीनी । घोस बोस मीतर कहि दीनी ॥ यहि विधि जात वरण ठहराई । असल नकल दोनों मिलजाई ॥ असल नकल मिल एक जो भैऊ । मान बड़ाई जिव सब गहेऊ ॥ जात वरनमें जिव अरुझाना । बिन श्रमसाधु सो बंधनभाना ॥ जिमि नृप जातिवरन बिलगाई । भांति भांतिकी रीति चलाई ॥ तिमि विदेव तिहुँपुरके राजा । कीने जकतकेर सब काजा ॥ पद्मदर्शन पांखंड बनाई । श्रुति स्मृतिमें जग अरुझाई ॥ कुल मरजाद थाप सो सारा । बंधनमाह बंधा संसारा ॥ जातिवरनके हृदमें जोई । संसारी कहलावै सोई ॥ पद्मदर्शनके हृदके माहीं । जातिवरनको बंधन नाहीं ॥ सो बेहृदके चालनहारे । साधु सो मुक्तिके मग पग धारे ॥ हृद बेहृद दोहू जिन त्यागा । गुरुलखि परमधर्ममें लागा ॥ जाति वरन सब मिथ्या होई । ताको साधु न माने कोई ॥ विप्र शूद्र कर्महि ते होई । उत्तम मध्यम कर्महि जोई ॥ गजते अचल मुनीश उपाये । केशपिंगल मुनि उल्लू जाये ॥ पुण्य अगस्त्य अगस्त्यउपाना । कौशिकमुनि कुशसे प्रकटाना ॥ कपिसे कपिल मुनीस उपाये । लता शाखगौतम ऋषि जाये ॥ दोनासे द्रोनाचार्य बखाना । ऋषि तीतरी तीतरसे माना ॥ रजसे परसराम प्रकटाये । शृंगी ऋषि हरनीके जाये ॥ कैवर्तिनसे व्यास कहाई । विश्वामित्र चंडालिन जाई ॥ ब्रह्मा आप कमलसे होई । सकल सृष्टिको करता जोई ॥ वेश्यासे वशिष्ठ मुनि भैऊ । इत्यादिकमुनि ब्राह्मण कहेऊ ॥ नहीं ब्राह्मणी इनकी माता । तऊ जकतमें द्विज बिरुयाता ॥

( २००४ )

बोधसागर

९६

उत्तम मध्यम कर्महि आही । कर्मते उग्र क्षुद्र है जाही ॥ सत्यकबीर वचन

साखी—जबलगि नाता जातिको, तबलगि भक्ति न होय । नाता तोर हरि भजै, भक्त कहावै सोय । बड़े गये बड़ आपने रोम रोम हंकार । सतगुरुकी परचै बिना, चारो बरन चमार ॥

रमैनी

पहिलो तारो कोरि चमारा । फिर तारो राजन दरबारा ॥

शब्द

नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठाने नर प्रानी ॥ पठेरे भरथरी चारो वेदा । बिन सतगुरु नहिं पायौ भेदा ॥ गोरख खोजत जन्म सिराने । कायाकी गति उनहु न जाने ॥ पंडोने बहु विप्र हंकारा । तबहुँ न घंटबजा ओहि बारा ॥ जवहिजुरेहेकोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घंट अधरबिच बाजा ॥ जवहि श्वपच मंदिर पग धारा । बाजै घण्ट होय झनकारा ॥ कहे कबीर चारो बरन है नीचा । सबसे श्वपच भक्त है ऊँचा ॥

चौपाई

वैशांपायन ऋषिके पास । नृपतियुधिष्ठिर वचन प्रकाशा ॥ कृपाकरो कहिये ऋषि राया । कहगुनगही ब्राह्मण कहलाया ॥ तब ऋषिराय कहे समुझाई । ब्राह्मणको यह गुण बतलाई ॥ गहे धर्म अरु धर्मके गुनको । कबहुँ अधर्म अकर्म न उनको ॥ दुतिये कबहुँ मांस न खावै । कबहुँ न कोई जीव सतावै ॥ प्रथमें वस्तु पड़ी कोई पावै । बिन स्वामी आज्ञा न उठावै ॥ काम क्रोध लोभ मोह मत्सर । कबहुँ न जगविषयनमेंचितधर ॥ पंचम गहे पंच न गुन जबही । तप दम दया सत्य प्रियसबही ॥

९७

जीवधर्मबोध

( २००५ )

सोई ब्राह्मण जब ये गुन गहिये । बिन गुन सदा शूद्र तेहि कहिये ॥ जो चंडालमें ये गुन होही । निश्चय ब्राह्मण जानो सोही ॥ षटउर्मी विकार सब माहीं । गुण करि विप्र शूद्र विलगाहीं ॥ जो गह परमारथ शुभ करनी । मुक्तसे और चाह नहिं धरनी ॥ शमदम दान आदि शुभ गुन गह । ऋद्धि सिद्धि आदिक गुन गन लह ॥ एकै विधि चहुँ बरन बनाया । रुधिर विन्दुते सबकी काया ॥ सतसंगमें सब एकै जाती । लिखा भागवतमें यहि भांती ॥ नृप शौनक चहुँ बरन बनाये । गुण करि भिन्न भिन्न विलगाये ॥ केते शूद्र विप्र है जाही । केते विप्र शूद्र गुन ग्राही ॥

इति वर्णार्थम मिथ्या

अथ कर्तापुरुष विवै शवजीवनका विचार—चौपाई

अलख अगोचर जो प्रभु अहई । तासु कथा कैसे कोइ कहई ॥ हरि हर ब्रह्मा पार न पावै । और जीवकी कौन चलावै ॥ कर्ता पुरुष जत्तको जोई । ताको नाम न जाने कोई ॥ जेते नाम जत्तते माहीं । राय निरञ्जनको सब आहीं ॥ वेद कहे जस अण्ड उगाये । ताते अण्डज ब्रह्मा जाये ॥ नारा जलको नाम बतायन । जलमें गृह कीनो नारायण ॥ के पुनि जलको नाम कहे जो । जलपर शयन करे सो केशो ॥ निर्णय स्वसंवेद पुनि भाषा । अण्डज देव निरञ्जन राखा ॥ बहुरि कहे तो रेतको लेखा । ईश्वर जलपर तरते देखा ॥ पुनि जन्मुर जाहि निरताये । जलपर शब्द यहूह उठाये ॥ गर्ज यहूह ससुद्र न ऊपर । वासा ईश्वर करे जलनपर ॥ यह सबही उर ला व्यौहारा । करता भेद है अगम अपारा ॥ अस प्रभु किमि बिचारते जानी । ताते सुन सतपुरुषन बानी ॥

( २००६ )

बोधसागर

९८

सत्यपुरुषनकी बचन जो सुनिये । पुनि पुनि निज हृदयेमें गुनिये॥ करि बिचार गहिये सत सारा । जाते उतरे भवनिधि पारा ॥

इति

अथ धर्मव्योरा वर्णन-चौपाई

सब धर्मनको व्यौरा वर्णों । जेते धर्म कर्म संचरणो ॥ स्वसंवेद है सबकी आदी । ताते सकल मता मरजादी ॥ वेद अरु वानी जेते जगमहैं । स्वसंवेद है सकल पितामह ॥ ताते चार वेद प्रकटाने । आदि पिताकी खबर न जाने ॥ स्वसंवेद ते वेद बनाये । तामें ऋषि मुनि मता मिलाये ॥ यज्ञादिकमें हिंसा कर्मा । सो नहिं स्वसंवेदको धर्मा ॥ ऋषि मुनिनिज२शब्द जो मेला । ताते खिला और कछु खेला ॥

दोहा-पा कहिये त्रैदेवको, भाग कहावै खण्ड ।

ताते धर्म जो प्रकट भे, तासु नाम पाखण्ड ॥

चौपाई

षटदरशन सातवे पाखण्डा । धर्म कर्म पृथ्वी नौ खंडा ॥ सबही तीन वेदके अंशा । ऋषिमुनिसकल निरंजनवंशा ॥ स्वसंवेदते वेद भे चारी । ताते चार किताब निकारी ॥ स्वसंवेदते गह त्वच ज्ञाना । ताते सर्व शास्त्र बंधाना ॥ पञ्जः साम ऋग्वेद जो तीनी । तौरैत जम्बूर इक्षील कीनी ॥ अथर्वन वेदणे रचे कुराना । मता महम्मद सकल बखाना ॥ पीर नवी निज मता मिलाई । वेद विरुद्ध कर्म ठहराई ॥ यहि विधि भये विरोधी सारे । स्वसंवेद तजि पथगह न्यारे ॥ पांच तत्त्व गुण तीन कहाया । शक्ती और निरञ्जन राया ॥ इनहीकी पूजा जगमाहीं । परमपुरुष कोई जानत नाही ॥ शक्ति निरञ्जन छल बल कीने । परम पुरुषपद परदा दीने ॥

११

जीवधर्मबोध

( २००७ )

भिन्न भिन्न पूजा परकाशा । सकल जीव गल डारे फांसा ॥ रजगुण ब्रह्मा है संसारी । कर्मजाल जिन जक्त पसारी ॥ तमगुण रूप महादेव केरा । भवसागरमें ताको डेरा ॥ सतगुन मारग जो कोड धरई । भवसागरके पार उतरई ॥ द्रन्द खेल सतगुणमें बतें । ताहु भिन्नभाव बहु करते ॥ प्रथमहि विष्णु संप्रदा चारी । दुतिये सत्यपंथ आचारी ॥ वेद कि विधि पूरणता पावै । स्वसंवेद कह तब समुहावै ॥ जीवहि अवश्य कर्म सो करनो । सतगुणकी मारग पग धरनो ॥ सात प्रकार कहों पुनि धर्मा । भिन्न-भिन्न तिनको सुन भर्मा ॥ शक्ति निरंजन त्रिगुन है पांचो । वेद विदित शुभ धर्म है सांचो ॥ छठा धर्म कहिये शैतानी । जिनको गुरु इबलीस बखानी ॥ सप्तम धर्म कबीर कृपाला । जरतजक्त जिव जिन प्रतिपाला ॥ प्रथमें ब्रह्मा रजगुण कहिये । कर्मकांड सब ताते गहिये ॥ दुतिमें विष्णु उपासना हेता । तृतिये शंभु योग चित चेता ॥ चौथे ज्ञान निरञ्जन राया । पंचम शक्ति पसान्यौ माया ॥ तीन तीन विधि तिनमें आही । उत्तम मध्यम कनिष्ठ कहाही ॥ छठे धर्म इबलीसको जाई । तीन विभाग ताहुमें होई ॥ ॥ उत्तम कर्म करंता जोई । बुधि विद्या सागर है सोई ॥ कोड गुणगण कोड धनमद पूरे । कोड बाह विजयी है शूरे ॥ जो मद मान सहित हंकारा । मैं बड़ डोरहि तुच्छ विचारा ॥ मोरे योग गुरु कहूँ नाहीं । सो शैतानको पन्थ गहाहीं ॥ उत्तम कर्म जो करे करावै । मलिन कर्म लख दूर परावै ॥ ऐसे सुकर्म करे जो लोगा । ताते नर्क भोग नहि भोगा ॥ तिनको आवागौन न छूटे । योनी संकट पुनि पुनि जूटे ॥ दुतिये आपन उत्तम करनी । और सिखाये सुख कह बरनी ॥

( २००८ )

बोधसागर

१००

तृतिये करे करावै पापू । घोर नर्क अह तिनका थापू ॥

दोहा-विविधि कह इबलीस जन, उत्तम मध्यम नीच ।

जस मति तस गति प्रेरिके, ल्यावै तिनको खींच ॥

चौपाई

कोई रजोगुण कर्म कहीजै । कोई मलीन रजोगुण भीजै ॥

कोई सतोगुण धर्म प्रचारा । कोई मलीन सतोगुण धारा ॥

कोई तमोगुण ऐसे जानो । विविधि भेद तिनमाह प्रमानो ॥

पञ्चधर्म षट्धर्म बखाना । इहाँलो विषय वासना नाना ॥

यह षट्धर्म जत्तमें जागे । सकल नारि नर तिनमें लागे ॥

छवो त्याग सप्तम जब चीन्हा । सत्य पन्थपर तब पग दीन्हा ॥

देव कबीर धर्म नयसागर । तापद गहि बीते सब झागर ॥

विषय विकारकी भै तब हानी । सरिता सकल सिंधु ससुहानी ॥

निश्चल होहि पाय प्रिय अपना । जहँ नहिं अमभय केर कल्पना ॥

मन बानीते पार जो होई । ताकी कथा कहे किमि कोई ॥

मीन विहंग कि मारग दूँढ़ा । बुद्धिविहीन विचारन सूढ़ा ॥

पठि गुण तोता कहे कहानी । बिना विचार मूलकी हानी ॥

झूठना

मूल जाने बिना धूल रसरीवरे मीन पग पंथ कहु कौन पावै ॥

दूर नेरे नहीं क्रूर हेरे तही बिना गुरु गम्य तेहि को लखावै ॥

जासुको नाम नहीं रूप नहिं रेख है भेष आलेख कह देख कोई ॥

बकत बहु वाय है सार नहिं पाय है घोषको धर्म गहि भर्म भोई ॥

स्वप्नकी वस्तु जौँ दूँढ़ जागृतमें हाथ आवै नहीं यत्न कीने ।

चारहु दशाते पार सरकार जो तासु दरबार पथ कौन लीने ॥

खेचरी भूचरी चाचरी अगोचरी योग अरु युक्ति सब रहै पोले ॥

दुन्मुनी खातजहँ उन्मुनीफिरत है अलककीझलकको पलकखोले ॥

१०१

जीवधर्मपौध

( २००९ )

भक्ति नौधा कही प्रेम पौधा यही बृद्धि विन सृद्धि नहिं यार आवै । यार चीन्हा नहीं प्यार कीना वृथा नाद अरु नृत्य कह गीत गावै ॥

इति श्रीधर्मव्यौरा

अथ वेदधर्म व्यौरा

दोहा—सतगुण सबमें श्रेष्ठ है, सतगुण विष्णु देव । सतगुणकी साखा गहे, लहे अगमको भेव ॥

चौपाई

सतगुनको सेवै बैरागी । तन मनते प्रभु सेवा लागी ॥ चार संप्रदा सगुण उपासी । नौधा भक्ति गहे सुखरासी ॥ भाव भक्ति प्रभु प्रतिमा पूजा । राम कृष्ण सम और न दूजा ॥ कोई बाल रघुपति कर ध्याना । कोई कृष्ण शिशु सेव प्रमाना ॥ नाना भांति सेव जिवधारी । लक्षण जानकी औध विहारी ॥ गान करहि बहु साधु समाजा । नादनृत बाजहि बहु बाजा ॥ धर्म वैष्णव परम सोहाई । दान पुण्य अति उज्ज्वल ताई ॥ गृह आश्रमी भाव भल धरही । सन्त गुरुकी सेवा करही ॥ वेद धर्मकी बात घनेरी । जहैंतहैं कविकृत मिश्रित हेरी ॥ ताते शुद्ध न व्यौरा लहिये । जो जिहिभाव सोई गति गहिये ॥ पौरानिक बहु कथा कहानी । शुद्धाशुद्ध जत्त विहरानी ॥ व्यास आदि ऋषिसुनि बहुतरे । जो जेहि भासा सत्यसो टेरे ॥ केते पंडितन ग्रंथ सँवारी । व्यासनाम धरि जत्त प्रचारी ॥ पुरुष प्रमानि बचन प्रमाना । सो विधि गहे भर्मभय भाना ॥ झूठ साँच जो कछु जगमाँही । निश्चय किये सत्य दरसाही ॥ झूठकी जबही झुठाई जाना । तब तेहि त्यागहि पुरुष सयाना ॥

इति वेदधर्म

( २०१० )

बोधसागर

१०२

अथ जैनधर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

जैनधर्मं जिव दाया भारी । हिंसा पंथ नसो पग धारी ॥ शौच क्रिया जैनीमें थोरी । सतगुण मलिन मतामय सोरी ॥ रात समै ढिग जल नहिं घरही । अशुचि शरीर रहै का करही ॥ अशुचि देह नहिं मन सकुचाही । इन्द्रो शुद्ध बिना जल नाहीं ॥ देवी देवकी सेवा साधन । यन्त्र मन्त्र बहु देव अराधन ॥ दिन गति जबहि रैन नियरावै । जल अरु अन्तनसो कछु खावै ॥ प्राण जाय तो जान दे भाई । सुखमें कबहुँ न जल परिजाई ॥ महा कठिन व्रत जैनी ठाना । भूखसे त्यागे अपनो प्राना ॥ जेते इतर धर्म बहु भांती । जैनी सबहि कहै मिथ्याती ॥ जैनेश्वरकी केवल बानी । इतर ग्रंथ नहिं जैनी मानी ॥ दान पुण्य अरु शौच अचारा । जैन धर्म अति अल्प निहारा ॥ दान पुण्य बिन कर्म जो करही । उर कठोरता जैनी धरही ॥ दान पुण्य नहिं जहां निहारा । हृदयमें न होय उजियारा ॥ दाया कहां जहां नहिं दाना । बिना दान किमि हो कल्याना ॥ तप जप करि साधू कछु सुखिया । जैनी गूही दान बिन दुखिया ॥ जैन यती वह सीष सिपाई । जो ताहुके धन अधिकाई ॥ फूटे कूपमें धनबरु डारो । बिना पात्र मतिदान बिचारो ॥ पात्र बिना नहिं देत जो दाना । तिनके पात्र मिलै नहिं आना ॥ तिनके पात्र हैं साधू जैनी । भोजनदान तिन्है कछु दैनी ॥ घरघरते भिक्षा ले येई । एक ठौर भोजन नहिं लेई ॥ ताते जैनमें दानकि हानी । जीव दया सुख पावै प्रानी ॥ बिना दिये पावे किमि कोई । देन लेन चारो युग होई ॥ दान न करहिं बर्त बहु करही । करि करि बर्त भूखते मरही ॥ जो नहिं देहे सो नहिं पैहै । निश्चय भूखते प्रान गवैहै ॥