भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९६७ )

शरणागतको धर्म यह तन मन करिये भेट । गुप्त प्रकट सब आपिये पुनि यम गहे न फेट ॥ फेट गहे तब कौन सकल तेरौ नहिं मेरो । बाहर भीतर पौर ठौर सब तेरौ डेरो ॥ तेरौ डेरो भयो वस्तु तामें सब तेरी । तूही तहैं रखवाल छुटी सब संशय मेरी ॥

चौपाई

अब कलिमें आयू नर थोरी । को चित योग युक्तिमें जोरी ॥ पुण्यदान कह ध्यान अगाधू । कर्मविहीन गृही अरु साधू ॥ ताते शरनागत सुखदाई । और यतन कलिमें नहिं पाई ॥ कलिके जीव अनन्त अपारा । शरण कबीर होय भवपारा ॥ मूर्ख पुरोहित जस बिन ज्ञाना । ताको दान देत यजमाना ॥ दृढ़ है सतगुरु शरण गहीजै । सकल भर्मभय ताते छीजै ॥

सत्यकबीर बचन-शब्द

बिरिजमें महारि न खेले सिकार । चारपांच दश बीश महाभट संग लीने तीनो भरतार । मीनरूप है रहै जगतमें डारि बहावै तिरगुन जार ॥ जलरूपी है रहै संत कोई गहि पकरे गुरुचरण करार । कहै कबीर सुनो भाई साधो यहि ते रहियौ सदा होशियार ॥

इति शरण

अथ सतसंग कुसंगका वर्णन-चौपाई

सर्व शास्त्रको यामें एका । बिनसतसंग न उपजे विवेका ॥ बिनविवेक नहिं उज्जल करनी । जाते मुक्तिपन्थ पग धरनी ॥ सतसंगतकी महिमा भारी । लिखते शेष शारदा हारी ॥ वेद कतेब पार नहिं पावैं । संतनको नित गुन गन गावैं ॥