कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
५८
छटयें आपको प्रभुहिं समपैं । ताको कबहुँ काल नहिं दपैं ॥ यह षट्गुन जो कोई धारा । शरणागत पलमें कर पारा ॥ काहू साधनको नहिं काजा । शरणागती सकल सुखसाजा ॥ कोइ कोइ आचारज हैं ऐसे । शरणागत विधि भापे जैसे ॥ निशदिन प्रभुको ध्यान लगावैं । यक क्षण भरि बिसरै नहिं पावैं ॥ टुटै न तार भजन दिन राती । शरणागत कहिये यहि भांती ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-कबीर जो जाकी शरन गहै, ताको ताकी लाज । उलटि मीन जल चढ़त है, बह्यो जात गजराज ॥
चौपाई
जल अरु मीन कि प्रीति निहारो । तजे प्रान हो जलते न्यारो ॥ ऐसे सतगुरु पद रति राते । निशदिन तासु ध्यानमें माते ॥
कुण्डलिया
रामानन्द कि फौजमें, कबीरके शिरमौर । लूला लँगड़ा पांगुला, सबको करि गये ठौर ॥ सबको करि गये ठौर, सुनो कलिके नर नारी । गहिये ताकी शरण, हरण भवकी भय भारी ॥ भय भारी हटजाय, उपाय न कलिमें दूजी । मेटे यमकी त्रास, आस ताहीते पूजी ॥ शरणगहे सुख होय जिव, बीते सकल कलेश । गह्यौ बिभीषण शरण हरि, कीन्हा लंक नरेश ॥ कीन्हों लंकनरेश देशपति, प्रथम सो रहेऊ । शरण कबीर सराहि, जाहि खल दल बहु तरेऊ ॥ तन्यौ थपच चंडाल, डाल अघरहेऊ नकनिका । परमपुरुष पद पाय, यथा काशी की गणिका ॥