भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९६३ )

गुरुविन कहो गाँठि को खोले । गुरुविन अंध टटोलत डोले ॥ बारबार कर गुरु गुण गाना । कहा कौन गुरुदेव समाना ॥ धन्य धन्य गुरु देव गोसाईं । तान्यौ भव गोखुरकी नाईं ॥ गुरुगुरु जपिके जागे योगी । विरति विचार प्रपंच वियोगी ॥ जादिनते गुरु शरनमें आये । तादिनते दुःख दोष दुराये ॥ गुरुकी पारन सकल सुखदाईं । गुरुप्रमाद अमरावति पाईं ॥ जौ गुरु जीवहि नाम न देता । तौ कहु कौन मुक्तिपद चेता ॥ ताते गुरु सब सुखको कारन । तासु चरनरजकर शिर धारन ॥ धन्य धन्य सो शिष्य बड़भागी । तन मन धन गुरुसेवा लागी ॥ तीरथ व्रत कछु काज न नाहीं । गुरुके चरणनमें पति जाही ॥ गुरुसमान तीरथ नहीं औरा । गुरु महात्मविदित सब ठौरा ॥ कोटिन तीर्थ गुरुजीके चरना । संत कबीर जो निजुमुख वरना ॥ गुरुको शीव न मानै जोईं । सो जिव निश्चय जाय बिगोईं ॥ गुरुसे लगन जासुकी लागे । तन मन धन तनसम सो त्यागे ॥ अब सुनिये गुरुपारख पदको । सोई परम गुरु है बेहदको ॥ हदके गुरुको जिन भल पूजा । ताहि मिले पारख गुरु दूजा ॥ हद बेहद माह गुरु सोईं । बिना ज्ञान लखि परत है दोईं ॥

सत्यकबीर बचन-चौपाई

गुरुसम दाता कोइ न भाई । मुक्तिको मारग दियौ बताई ॥ गुरुविन हदये ज्ञान न आवै । ज्यों कस्तूरी मृगा भुलावै ॥ गुरुविन मिटै न अपनो आपा । धर्मजबड़ी बांधा शापा ॥ गुरुविन केहरि रूपमें पड़िया । गुरु विन गजछायासे लड़िया ॥ गुरुविन श्रान देखि बहु भेषा । मन्दिर एक काँचकी देखा ॥ चहुँदिश दीस आपनी छाया । भूकत भूकत प्रान गँवाया ॥