कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १९६४ )
बोधसागर
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गुरुबिन सुवा नलनिसे बंधा । गुरुबिना कपि पड़ौ जो फंदा ॥ कहे कबीर भर्म संसारा । बिन सदगुरु को उतरे पारा ॥ सार्वी-भर्म जेवड़ी जगबंधा, फिर जन्मै मरिजाय । कहैं कबीर सतगुरु मिलै, तब सतलोकसिधाय ॥ मीन चकार मगल मधु, पशु है तजै न नेह । नर है तजै कबीर जो, तिनके मुँह दे खेह ॥
शब्द
नरको नहिं परतीत हमारी । झूठी बनिज कियौ झूठे संग पूजी सबै मिलिहारी ॥ शब्दरशन मिलि पंथ चलायौ तिरदेवा अधिकारी ॥ राजा नय बड़ो परपंची रैअत रहत उजाड़ी ॥ इतने उत उतते इत राखत यमकी साट सँवारी ॥ ज्यों कपि डोरि बांधी बाजीगर अपनी खूशी रारी ॥ इहै पेड उतपति पल्यको विषया सबै बिकारी । जैसे श्वान अपावन राजित त्यों लागी संसारी ॥ कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को मानै बात हमारी ॥ अजहुँ लेव छोडाय कालसे जौकै सुरति सँभारी ॥ दोहा-गुरुकी महिमा अधिक है, थके विष्णु विधि वाम ॥ जोरि युगलकर पायपरि, कोटि कोटि परनाम ॥
इति नर शरीर गुरुआधीन
अथ शरनागतीको वर्णन-चौपाई
सतगुरु शरण सकल सुखदाई । ताते जिव सत लोक समाई ॥ साचे गुरुकी गहिये शरना । सोई जीव दुसह दुःख हरना ॥ झूठे गुरुसे काज न सरिहै । धोखे जिव यमके सुख परिहै ॥ सूर कि शरण परे जो कोई । सो जिव कबहुँ न जाय बिगोई ॥