भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०४८ )

बोधसागर

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अथ मनुशतव्रता और नूहकी एकता-चौपाई

मनुशतव्रता नूहको जानी । पल्लय पयोध जो राख्यौ प्राणी ॥ नाव बहेतरा मनु नृपाला । रच्यौ बचावनजिव तेहिकाला ॥ ताही बहेत्रा सकल चढ़ाई । तेहि औसर जल परलय आई ॥ तब हरि लियौ मीन औतारा । दौय सींग निजु शीशमें धारा ॥ मीन रूप जो विष्णु बनाई । ताहि बहेत्रा शृंग लगाई ॥ भलिबिधि बांधे बहेत्रा ताही । निजु बलते गहि राख्यौ वाही ॥ नाव बाँधि हरि आन्हा दैऊ । मनुजाये तह आसन गहेऊ ॥ लीने सप्तऋषी निजु संगा । आठ जीव बैठे यहि ढंगा ॥ चहुँ दिश तबहि जलामय होई । भे संहार बचा नहिं कोई ॥ तरे बहेत्रा जलके माही । आठो जीव तहां बचि जाही ॥ प्रलैय कीन फिर सृष्टि बसाये । धर्म महम्मद अस बतलाये ॥ प्रलय पिछारी नूह पुकारा । प्रथमें नाम और कछु धारा ॥ आदिको नाम नूह ना होई । बदलि गयौ पीछे ते सोई ॥

इति मनुशतव्रत।

अथ महादेव और महम्मदकी एकता-चौपाई

श्रीमुख सत्यकबीर बखानी । महम्मद महादेव सो जानी ॥ महादेव क्षत्री रन वाके । सोह महम्मदकी है साके ॥ धर्म जासुको शस्त्र प्रहारा । सोई करे सृष्टि संहारा ॥ तमगुण आदिमें वेद बखाना । रुह महम्मद प्रथम उपाना ॥ तमगुण आदि सृष्टिको करता । भवसागर ताते थिर धरता ॥ भव है नाम महादेव केरा । ताते यह भवसागर टेरा ॥ भव भवानी द्वै रूप बनाया । भवसागर सरदारी पाया ॥ शिवके संग नारि द्वै जानी । शीश गंग कटि गौरि भवानी ॥ महम्मदमें मकार द्वै देखो । दोहू नारि तेहि संग विशेषो ॥ दोउ मकार महम्मद नामा । गंग गौरि बरणो वर बामा ॥