कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०४९ )
आप भिखारी अनधन देही । महम्मद महादेव है येही ॥ धन अरु दर्ब चाकरन पाही । आप अलोनो साग जो खाही ॥ महा उदार महम्मद दाता । जत्तमाह सो शिव विख्याता ॥ योग भोग दोनों गुण भीजा । साबर मन्त्रो दोवा तवीजा ॥ योग युक्ति शिववर्त बताया । उत नमाजा रोज ठहराया ॥ ये ऊँकार शब्द गोहरावै । वे भोरे उठि बाग उठावै ॥ खड़ी एक नस महम्मद माथे । दंडाकार तिलक तेहि साथे ॥ प्रकट दोऊ भृकुटीके बीचे । मस्तक अंत प्रजंतलों खींचे ॥ जस कबीरमुनि तिलक कराही । सोई महम्मद मस्तक माही ॥ कोधवंत जब महम्मद बोले । तेहि औसर सोई नस डोले ॥ रोमधार यक उर बिच धारी । सोऊ दंडाकार सँवारी ॥ नाभिते कंठप्रजंतलो सोही । जन कबीर मुनि रूप है ओही ॥ शिवके संग रहे बहु देवी । तिमि बहु तारि महम्मद सेवी ॥ चीन्ह चक्र सब ताके साथ । आदिभक्ति सोई पशुनाथा ॥
इति श्रीमहादेव और भहम्मदकी एकता
अथ हनुमान और अलीकी एकता
छन्द—मूलना
हंक हनुमानते लंकमें शंकभ अलीके हंक गढ बंक टूटे । अली हनुमान दोऊ बांहके बली अरि अनी दलमली ज्यौ सनी कूटे ॥ १ ॥ शूद्र जेहि शत्रुगण वीर्य सामुद्रधन रुद्र शिव देखि दल दैत फूटे ॥ शूर संग्राममें गुणनके धाम दोऊ अली हनुमान गुणमाहँ जूटे ॥ २ ॥
इति हनुमान
अथ परशुराम और मूसाकी एकता—चौपाई
परशुराम मूसा यकताई । ऐसे दोहुको मेल मिलाई ॥