भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०५४ )

बोधसागर

१४६

चौरासी लख मीन बनाये । मन मछुवा सब तिनहि फसाये॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

तन झौपडी मन बसै महरवा ।

नान्हेनान्हे डोभवन बीनै महजरवाडारि दिये नियक भरमसगरवा ।

गहिरैमें महरा पैठि न सकै विन बूड़े नहि मिलत सिकरवा ॥

यक ओर महरा यक ओर महरी मारि लिहे नियक मोहमछरवा ।

कहै कबीर सुनो भाई साधो ताकि लिहे नियक अमर सहरवा ॥

चौपाई

तीन देवमें विष्णु बड़ेरे । तिनको हुकुम फिरे चहुँ फेरे ॥

तीन लोक भवसागर माही । तीन देव तहाँ राज कराही ॥

तीन लोकको सूत्र बखानो । जामें सकल जीव भरमानो ॥

प्रथमहि विष्णु सर्व शिरमौरा । तासु हेठ सुरगण सब औरा ॥

दुतिये पौरी विद्याधर है । नहीं देवता नहिं सो नर है ॥

सुर नर माह जान यह सीढी । भाषो बहुरि तीसरी पीढी ॥

नर वानर यक लेखे कहिये । यक व्यौहार दोहमें लहिये ॥

दोनों बीच भेद अति थोरा । पशु अरु मानुषमें यह डोरा ॥

विन दुम नर कपि पूछ समेता । नर वानर यक गुण कह केता ॥

औरैंग औटैंग वानर जोई । नर आकार सर्व सो होई ॥

अंगरेजीके ग्रंथन माहीं । विना पूछ वानर यह आहीं ॥

दोनों पगते नर ज्यों चाले । दोनों हाथ काममें डाले ॥

वानर इतर जाति बहु तेरे । भिन्नभेद क्रम क्रमसे हेरे ॥

अंगरेजी अखबार बखाने । द्वै मानुष दुमदार लखाने ॥

हवशदेशको जंगल जहँवा । द्वै मानुष दुम युत रह तहँवा ॥

डेढ़ हाथकी पूछ सो गहई । मादमें पशु समान सो रहई ॥

एक जाति मानुषको आही । रहे हिमालय पर्वत माही ॥

ऐसो निकट छोड़ तनधारी । पंछिन संग मचावै रारी ॥