कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०५३ )
जो संयोग कबहु गह सोई । जूवा दंड यकठे होई ॥ आपै आप मिले जो आई । पैठे ताहि छिद्रमें जाई ॥ बिन सहाय जूवामें पैठे । पहिली ठौर ठेकाने बैठे ॥ ऐसी दुर्लभ मानुष देही । चौरासी भ्रम पावै येही ॥ धर्म महम्मद बहुरि बतावै । एक बार मानुष तन पावै ॥ सूसा ईसा मतमें सोई । फेर नहीं मानुष तन होई ॥ वेद करे पुनि ऐसे वर्णन । पुनि पुनि जीव लहै मानुष तन ॥ आठ लक्ष योनी भ्रमि आवै । पुनि गह जीव मनुष तन पावै ॥ सत्यकबीर जो बचन उचारा । अति दुर्लभ मानुष औतारा ॥ नरतनु पाये न भक्ति विचारा । सो पापी आतम हत्यारा ॥ सुरदुर्लभ यह मानुष देही । सो तन लहै भजु परम सनेही ॥ चार खानिके जीव अपारा । जो थावर जंगम तन धारा ॥ कोइ दीर्घ कोइ सूक्ष्म देखो । भारी थूल हरु लघु लेखो ॥ नाना वर्ण और गुणधारी । पूरि रहे भवसागर झारी ॥ युगन प्रजंत काहु थित गाई । अतिसै लघु आयू कोइ पाई ॥ स्वर्ग नर्क चौरासी लाखा । सो सब अंड पिंडकी साखा ॥ भवसागर त्रिदेव भे राजा । सब जिव तिनके देठ विराजा ॥ सोई सुर सुरपति शिरताजा । तिनके हाथ है काज अकाजा ॥ भवसागरमें द्वै तट जानो । एक लोक यक वेद बखानो ॥ वेद कूलपर मन आसीना । लोकछोर माया गहि लीना ॥ मध्यमें तीन देव गुणधारी । महा अपर्बल पाँच शिकारी ॥ भ्रमसागर कहिये भवसागर । दश दिश काल मचायौ झागर ॥ भव पुनि भगको नाम कहावै । तामें सब जिव आवै जावै ॥ भव शिव नाम भवानी पतिको । जीव लखै को ताकी गतिको ॥ तीनों लोक वसै भग माही । बिन गुरु कृपा न बाहर जाही ॥ कोटिन योग युक्ति जो करिये । भग मारग पुनि पुनि पग धरिये ॥