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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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१४५

जीवधर्मबोध

( २०५३ )

जो संयोग कबहु गह सोई । जूवा दंड यकठे होई ॥ आपै आप मिले जो आई । पैठे ताहि छिद्रमें जाई ॥ बिन सहाय जूवामें पैठे । पहिली ठौर ठेकाने बैठे ॥ ऐसी दुर्लभ मानुष देही । चौरासी भ्रम पावै येही ॥ धर्म महम्मद बहुरि बतावै । एक बार मानुष तन पावै ॥ सूसा ईसा मतमें सोई । फेर नहीं मानुष तन होई ॥ वेद करे पुनि ऐसे वर्णन । पुनि पुनि जीव लहै मानुष तन ॥ आठ लक्ष योनी भ्रमि आवै । पुनि गह जीव मनुष तन पावै ॥ सत्यकबीर जो बचन उचारा । अति दुर्लभ मानुष औतारा ॥ नरतनु पाये न भक्ति विचारा । सो पापी आतम हत्यारा ॥ सुरदुर्लभ यह मानुष देही । सो तन लहै भजु परम सनेही ॥ चार खानिके जीव अपारा । जो थावर जंगम तन धारा ॥ कोइ दीर्घ कोइ सूक्ष्म देखो । भारी थूल हरु लघु लेखो ॥ नाना वर्ण और गुणधारी । पूरि रहे भवसागर झारी ॥ युगन प्रजंत काहु थित गाई । अतिसै लघु आयू कोइ पाई ॥ स्वर्ग नर्क चौरासी लाखा । सो सब अंड पिंडकी साखा ॥ भवसागर त्रिदेव भे राजा । सब जिव तिनके देठ विराजा ॥ सोई सुर सुरपति शिरताजा । तिनके हाथ है काज अकाजा ॥ भवसागरमें द्वै तट जानो । एक लोक यक वेद बखानो ॥ वेद कूलपर मन आसीना । लोकछोर माया गहि लीना ॥ मध्यमें तीन देव गुणधारी । महा अपर्बल पाँच शिकारी ॥ भ्रमसागर कहिये भवसागर । दश दिश काल मचायौ झागर ॥ भव पुनि भगको नाम कहावै । तामें सब जिव आवै जावै ॥ भव शिव नाम भवानी पतिको । जीव लखै को ताकी गतिको ॥ तीनों लोक वसै भग माही । बिन गुरु कृपा न बाहर जाही ॥ कोटिन योग युक्ति जो करिये । भग मारग पुनि पुनि पग धरिये ॥

( २०५४ )

बोधसागर

१४६

चौरासी लख मीन बनाये । मन मछुवा सब तिनहि फसाये॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

तन झौपडी मन बसै महरवा ।

नान्हेनान्हे डोभवन बीनै महजरवाडारि दिये नियक भरमसगरवा ।

गहिरैमें महरा पैठि न सकै विन बूड़े नहि मिलत सिकरवा ॥

यक ओर महरा यक ओर महरी मारि लिहे नियक मोहमछरवा ।

कहै कबीर सुनो भाई साधो ताकि लिहे नियक अमर सहरवा ॥

चौपाई

तीन देवमें विष्णु बड़ेरे । तिनको हुकुम फिरे चहुँ फेरे ॥

तीन लोक भवसागर माही । तीन देव तहाँ राज कराही ॥

तीन लोकको सूत्र बखानो । जामें सकल जीव भरमानो ॥

प्रथमहि विष्णु सर्व शिरमौरा । तासु हेठ सुरगण सब औरा ॥

दुतिये पौरी विद्याधर है । नहीं देवता नहिं सो नर है ॥

सुर नर माह जान यह सीढी । भाषो बहुरि तीसरी पीढी ॥

नर वानर यक लेखे कहिये । यक व्यौहार दोहमें लहिये ॥

दोनों बीच भेद अति थोरा । पशु अरु मानुषमें यह डोरा ॥

विन दुम नर कपि पूछ समेता । नर वानर यक गुण कह केता ॥

औरैंग औटैंग वानर जोई । नर आकार सर्व सो होई ॥

अंगरेजीके ग्रंथन माहीं । विना पूछ वानर यह आहीं ॥

दोनों पगते नर ज्यों चाले । दोनों हाथ काममें डाले ॥

वानर इतर जाति बहु तेरे । भिन्नभेद क्रम क्रमसे हेरे ॥

अंगरेजी अखबार बखाने । द्वै मानुष दुमदार लखाने ॥

हवशदेशको जंगल जहँवा । द्वै मानुष दुम युत रह तहँवा ॥

डेढ़ हाथकी पूछ सो गहई । मादमें पशु समान सो रहई ॥

एक जाति मानुषको आही । रहे हिमालय पर्वत माही ॥

ऐसो निकट छोड़ तनधारी । पंछिन संग मचावै रारी ॥

१४७

जीवधर्मबोध

( २०५५ )

चील्ह गीध गहि गगन उड़ाही । तेहि मानुषको धरि धरि खाही॥ तब सो नर गण जोरि सहाई । पंछिके संग करे लड़ाई ॥ ऐसे विविधि भांति नरजाती । तिनकी कथा न कथे सिराती ॥ नानारूप बरण गुणधारी । जहाँ तहाँ पृथ्वी माह विहारी ॥ चार लक्ष मानुषकी जाती । तिनकी कथा कथे बहु भांती ॥ जलमानुष थलमानुष देखो । वनमानुष आदिक बहु लेखो ॥ पशुमानुष कहु मिश्रित होई । अकथकथा कहि जात न कोई ॥ बहुरि कहो मानुष पशु ख्याला । सब परिवार जो करे उगाला ॥ भोजन पीछे पागुर करही । बिन उगाल तिनको दुःखधरही ॥ पशु नर नरपशु एक सो हेरी । देखहु कुदरत करता केरी ॥ छायारूपी नर कहु सरसै । चेष्टा दीख रूप नहिं दुरसै ॥ रचना विविधि भांति कहि गार्ई । ताको लेख लिखो नहिं गार्ई ॥ चौथो सूत्र बहुरि कहि गावो । जलचर मानुष मेल मिलावो ॥ रह समुद्रमें गर्गन मच्छी । अर्थ है मीन अर्थ तिय अच्छी ॥ कटिके ऊपर सुन्दर नारी । अर्थहेट मच्छी तनधारी ॥ कबहुके सागर तीर सुरखारी । कबहुके जलमें गोता मारी ॥ भुंगी ऋषि शिर सींग बताई । मुखमें सुण्ड गणेश गोसाई ॥ पंचम पौरी करो बखाना । पशुपंछीको मेल मिलाना ॥ चाम सुन्दरी वाको कहई । दोनों रंग ढंग गुण गहई ॥ सो नहिं खग अंडजकी जाती । चाम गूदरी है बहु भांती ॥ नहिं पशु नहिं खग मध्यम थापू । सुरगी एकसै परसे टापू ॥ वृद्ध नारि सो सुख है जाको । जब कोइ दुःख देत है वाको ॥ रुदन विलाप करे जस नारी । केते पशु खग नरगुण धारी ॥ दाडुर एक अमेरिका देश ! रुदन करे जब लहे कलेशा ॥ छठी पौरी बरणो सोई । जो चेतन रूप जड़ होई ॥

( २०५६ )

बोधसागर

१४८

लजवंयक पौधा चेतन । पशु पंछी सम चेत तासु तन ॥ जड़ चेतन गुण दोहू गहावै । पशु पौधाको मेल मिलावै ॥ सतई पौरीको अर्थावो । जो चेतन जड़ सम स्थिलावो ॥ पलपी तारा दोनों मछरी । सो सम चेतनते अति पछरी ॥ जड़ समान यक ठौर गहाई । हले न चले गहे थिरताई ॥ पलपी देह दाग बहुताई । जो कोइ ताको काटै जाई ॥ जैसे माली कलम लगावै । फूल बेलको काटि बनावै ॥ जेतनो टूक करें कोइ ताको । होहि पालपी सबही वाको ॥ जेतनी दाग रहे तब माही । सो सबही पलपी है जाही ॥ जड़ चेतन दोऊ ता ढंगा । जड़समान चेतनको अंगा ॥ अष्टम पौरी कहो बखानी । जड़मय योनि गोदजिव जानी ॥ नर नारकी लोक जिव पौरी । जड़सम सदा रहै एक ठौरी ॥ नर्कहेत नारकसो नाही । जैन मते दुख देखो नाही ॥ तीन लोकको सत जो भाषा । काया तरुकी पह सब साषा ॥ जैसो कर्म जीव जो कर्ता । तैसो तनधरि जगमें वर्ता ॥ सब जिव पुण्य पापकी आसा । पुनि पुनि कर योगिनमें वासा ॥ इति जीवधर्मबोध समाप्त

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The emblem is centered on a red background. It consists of a golden teardrop-shaped frame containing the Devanagari word 'प्रेमी' (Premi). Below this frame is a golden ribbon or banner with the text 'खेमराज श्रीकृष्णदास' (Khemraj Shri Kunnadas) written in Devanagari script. The entire emblem is surrounded by a wide, ornate golden border with a repeating pattern of stylized floral and geometric motifs.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.