भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 230

( १०२ )

अनुरागसागर

राजा यहि विधि सपना पाई । ततक्षण मंडप काम लगाई॥ मंडप उठा पूर्ण भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा॥ पुनि जब मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥ क्षणमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥ मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहिं लेत डुबायी॥ हारा नृप करि यतन उपायी । हरिमंदिर तहैं उठे न भाई ॥ मंदिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मन माहिं सम्हारी॥ हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहाँ हम जाई॥ आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीव न मोही चीन्हा ॥ पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहैं बनायउ जाई ॥ इन्द्रदमन तब सपना पावा । जहो राय तुम काम लगावा॥ मंडप शंक न राखो राजा । इहवाँ हम आये यहि काजा॥ जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु वचन हमारा॥ राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चल आयो॥ सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोधचित धारा॥ उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहम ना पावे॥ उमंगेउ लहर अकाशे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी॥ दरश हमार उदधि जब पाई । अति भय मान रहो ठहराई॥

छन्द

रूप धारयो विप्रको तब, उदधि हमपहैं आइया ॥ चरण गहिके माथ नायो, सर्म हम नहिं पाइया ॥

उदधि वचन

जगन्नाथ हम भोर स्वामी, ताहि ते हम आइया ॥ अपराध मेरो क्षमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥ ६९ ॥

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 230, कुल 2136 में से · BharatKosha