कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
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सो०-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये। वचन करो प्रतिपाल कर जोरै विनती करो ॥७३॥ कीन्हेउ गवन लंक रघुबीरा । उदधि बाँध उतरे रणधीरा ॥ जो कोइ करै जोरावरि आयी । अलखनिरंजन बोइल दिखाई ॥ मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेउ ओइल सुनु अन्तरयामी ॥
कबीर वचन
ओइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥ यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरण टेकिके चले हरषाई ॥ उदधि उमङ्ग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जाई ॥ मण्डप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवाँ कियऊ ॥ तब हरि पण्डन स्वपन जनावा । दासकबीर मोहिपहँ आवा ॥ आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमङ्ग नीरतहँ आयी ॥ दरश कबीर उदधि हट जाई । यहि विधि मण्डप मोर बचाई ॥ पण्डा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चलि आये ॥ पण्डन अस पासंड लगायी । प्रथम दरश मछेच्छ दिखायी ॥ हरिके दर्शन मैं नहिं पावा । प्रथमहि हम चौरालग आवा ॥ तब हम कौतुक एक बनाये । कहाँ वचन नहिं राखु छिपाये ॥ मंडप पूजन जब पण्डा गयऊ । तहँवा एक चरित अस भयऊ ॥ जहँ लग मूरति मण्डप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥ हर मूरति कहँ पण्डा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥ अक्षत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहिं ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥ देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मर्म न पाया ॥
पण्डा वचन
हम तुम काहि नहीं मनलाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥ क्षमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करो दोइ करजोरा ॥