कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अनुरागसागर
( १०३ )
सो०-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये। वचन करो प्रतिपाल कर जोरै विनती करो ॥७३॥ कीन्हेउ गवन लंक रघुबीरा । उदधि बाँध उतरे रणधीरा ॥ जो कोइ करै जोरावरि आयी । अलखनिरंजन बोइल दिखाई ॥ मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेउ ओइल सुनु अन्तरयामी ॥
कबीर वचन
ओइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥ यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरण टेकिके चले हरषाई ॥ उदधि उमङ्ग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जाई ॥ मण्डप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवाँ कियऊ ॥ तब हरि पण्डन स्वपन जनावा । दासकबीर मोहिपहँ आवा ॥ आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमङ्ग नीरतहँ आयी ॥ दरश कबीर उदधि हट जाई । यहि विधि मण्डप मोर बचाई ॥ पण्डा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चलि आये ॥ पण्डन अस पासंड लगायी । प्रथम दरश मछेच्छ दिखायी ॥ हरिके दर्शन मैं नहिं पावा । प्रथमहि हम चौरालग आवा ॥ तब हम कौतुक एक बनाये । कहाँ वचन नहिं राखु छिपाये ॥ मंडप पूजन जब पण्डा गयऊ । तहँवा एक चरित अस भयऊ ॥ जहँ लग मूरति मण्डप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥ हर मूरति कहँ पण्डा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥ अक्षत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहिं ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥ देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मर्म न पाया ॥
पण्डा वचन
हम तुम काहि नहीं मनलाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥ क्षमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करो दोइ करजोरा ॥
जगन्नाथकी स्थापना का वृत्तांत
( १०४ )
अनुरागसागर
कबीर वचन । छन्द
वचन एक मैं कहों तोसों, विप्र सुनु तू कान दे ॥ पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छोड दे ॥ भ्रम भोजन करे जो जिव, अंगहीन हो ताहिको॥ करे भोजन छूत राखे, सीस उठटे ताहिको ॥७०॥ सोरठा-चौराकरिव्यवहार, भ्रमाविमोचनज्ञानहृद ॥ तहाँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥७१॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहे सतगुरु पूरा । तुम प्रसाद भयो दुख दूरा ॥ जेहि विधि हरि कहँ थापउ जाई । सो साहिब सब मोहिँ सुनाई ॥ ता पीछे कहवों तुम गयऊ । कौन जीव कैसे सुकतयऊ ॥ कलयुगकेर कहो परभाऊ । और हंस परमोषेउ काऊ ॥ सो माहि वरणि कहो गुरुदेवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥
कबीर वचन
धर्मदास तुम बूझहु भेदा । सो सब हमसों कहो निषेदा ॥
चार गुरुकी स्थापनाका वृत्तांत
सुनहु सन्त यह ज्ञान अनुषा । गज थलदेस परमोध्यो भूषा ॥
रायबंकेजी
रायबंकेज नाम तेही आही । दीनेउ सार शब्द पुनि ताही ॥ कीन्ह्यो ताहि जीवन कडिहारा । सो जीवनका करै उबारा ॥
सहतेजी
शिलमिली दीप तहाँ चलि आये । सहतेजी एकसन्त चिताये ॥ ताहुको कडिहारी दीन्हा । जब उन मोकहँ निजकर चीन्हा ॥
१ किसी ग्रन्थमें यह चौपाई ऐसे लिखी है— सुनो संत यह कथा अनुषा । गज अस्थल परमोध्यो भूषा ॥
जगुजी
अनुरागसागर
( १०६ )
चतुरभुज
तहाँते चलि आये धर्मदासा । राय चतुरभुजपति जहँ वासा ॥ ताकर देश आहि दरभङ्गा । परखिसि मोहि सतपर संगा ॥ देखि अधीन ताहि समझावा । ज्ञान भक्ति विधि ताहि हद्दावा ॥ हद्दाता देखि ताहि पुनि थापा । मिला मोहि छाडि भ्रम आपा ॥ मायामोह न तनिको कीन्हा । अमर नाम तब ताही दीन्हा ॥ ताहूँ कहँ कडिहारी दीन्हा । चतुरभुजशब्द हेत करि लीन्हा ॥
छन्द
हँस निरमल ज्ञान रहनी, गहनी नाम उजागरा ॥ कुल कानि सबै बिसारि विषया, जौहरी गुण नागरा ॥ चतुरभुज बंकेज औ सहतेज, तुम चौथ सही ॥ चारिहँ कडिहार जिवके, गिरानिश्चल हम कही ७१ ॥ सो०-जम्बुदीपके जीव, तुम्हरी बाँह मोकहँ मिला ॥ गहे वचन दृढ पीव, ताहि काल पावे नहीं ॥ ७५ ॥
धर्मदास वचन
धन सत गुरु तुम मोहिं चेतावा । काल फंदसे मोहिं मुक्तावा ॥ मैं क्रिकर तुम दासके दासा । लीन्हों मोरि काटि जमफांसा ॥ मोते चित अतिहरष समाना । तव गुण मोहिं न जाय बखाना ॥ भागी जीव शब्द तुव माना । पूरण भाग जो तुव व्रत ठाना ॥ मैं अघकर्मि कुटिल कठोरा । रहेउँ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥ कहा जानि तुम मोहिं जगाये । कौने तप हम दशन पाये ॥ सो समुझाय कहो जियमूला । रबि तब गिरा कमल मनफूला ॥
धर्मदासके पिछले जन्मोंकी कथा कबीर वचन
इच्छा कर जो पूछा मोही । अब मैं गोइ न राखौं तोही ॥ धर्मनि सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहों विख्याता ॥
धर्मदासके पिछले जन्मकी कथा
( १०६ )
अनुरागसागर
सन्त सुदर्शन द्वापर भयञ् । तासुकथा तोहि प्रथम सुनयञ् ॥ तेहि ले गयो देशनिज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
सुपच वचन
कहे सुपच सतगुरु सुनलीजै । हमरे मात पिता गति दीजै ॥ बन्दी छोड़ करो प्रभु जाई । यमके देश बहुत दुख पाई ॥ मैं बहु भांति पिता समुझावा । मातु पिता परतीति न पावा ॥ बालकवत नहिं ज्ञान सिखावा । भक्ति करत नहिं मोहि डरावा ॥ भक्ति तुम्हारी करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन्ह मम आगे ॥ अधिक हर्ष ताही चित होई । ताते विनती करौ प्रभु सोई ॥ आनहु तेहि सत शब्द दृढ़ाई । बन्दीछोर जीव सुकताई ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
विनती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर वचन मान हम लीन्हा ॥ ताकर विनय बहुरि जग आवा । कलियुग नाम कबीर कहावा ॥ हम इक वचन निरंजन हारा । वाचा बंध उदनि पगु धारा ॥ और दीप हंसन उपदेशा । जम्बुदीप पुनि कीन प्रवेशा ॥ सन्त सुदर्शनके पितु माता । लक्ष्मी नर हर नाम सुहाता ॥ सुपच देह छोड़ी तिन भाई । मानुष जन्म धरे तिन आई ॥
सुपच सुदर्शन माता पिताके पहला जन्म कुलपति और महेश्वरीकी कथा
सन्त सुदर्शन केर प्रतापा । मानुष देह विप्रके छापा । दोनों जन्म होय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीन्हा ॥ कुलपति नाम विप्रकर कहिया । नारि नाम महेसरि रहिया ॥ बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि अस्नान सुर्यव्रत धारी ॥ अञ्जल ले विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कह दौरी ॥ तत्क्षण हम अञ्जल पर आवा । हम कहँ देखि नारि हरषावा ॥ बाल रूप धरि भेंटयो बोही । विप्र नारि गृह ले गइ मोही ॥
चन्दन साहूकी कथा
अनुरागसागर
( १०७ )
कहै नारि कृपा प्रभु कीन्हा । सूर्य व्रत करफल यह दीन्हा॥ बहुत दिवसलग तहाँ रहाये । नारि पुरुष मिल सेवा लाये॥ रहे दरिद्रते दुखी अपारा । हम मनमहँ असकीन विचारा॥ प्रथमहि दरिद्रता इनकर टारों। पुनिभक्तिमुक्तिकरवचनउचारों॥ जब हम पलना झटक झकोरा । मिलत सुवर्ण ताहि इकतोरा॥ नितप्रति सोन मिलै इक तोला । ताते भये वह सुखी अमोला॥ पुनि हम सत्य शब्द गोहराई । बहुप्रकारसे उनहि समुझाई॥ ता हृदये नहिं शब्द समायी । बालक ज्ञान प्रतीत न आई॥ ताहि देह चीन्हेसि नहिं मोहीं । भयोगुप्त तहँ तन तजि वोहीं॥
सुपच सुदर्शनके पिता माताके दूसरे जन्ममें चन्दसाहु और ऊदाकी कथा
नारि द्विज दोई तन त्यागा । दरश प्रभाव मनुजतनु जागा॥ पुनि दोनों भये अंशु मिलाऊ । रहहि नगर चन्द वारे नाऊ॥ ऊदा नाम नारी कहँ भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ॥ परसोतमते हम चलि आये । तब चन्दवारा जाइ पगटाये॥ बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीन्हेउताल माहि विश्रामा॥ कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई॥ पीछे ऊदा अस्नानहि आयी । सुन्दर बालक देखि लुभाई॥ दरश दियोदेहि शिशुतनधारी । लेगई बालक निज घर नारी॥ ले बालक गृह अपने आई । चन्दन साहु अस कहा सुनाई॥
चन्दनसाहु वचन
कहु नारी बालक कहँ पायी । कौने विधिते इहँवा लायी ॥ ऊदावचन
कह ऊदा जल बालक पावा । सुन्दर देखि मोर मन भावा॥ चन्दनसाहुवचन
कह चन्दनते मूरख नारी । वेगि जाहु दै बालक डारी ॥ जाति कुटुम्बहँसिहँ सब लोगा । हँसत लोग उपजे तन सोगा॥
नीमा नीरुका वृत्तांत
( १०८ )
अनुरागसागर
कबीरवचन धर्मदास प्रति
ऊदा त्रास पुरुष कर माना । चन्दन साहु जवै रिसियाना॥
चन्दनस हुवचन धर्मदास प्रति
बालक चेरी लेहु उठाई । लै बालक जल नेहु खसाई॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
चल चेरी बालक कहैं लीन्हा । जलमहँडारनताहिचितदीन्हा॥
चलिभइ मोहि पवारन जवहीं । अन्तरधान भयो मैं तवहीं ॥
भयउ गुप्त तेहि करसे भाई । रुदन करे दोनों बिलखाई ॥
बिकल होय मन दूदत डोलै । मुग्धज्ञान कछु मुखनहिं बोलै॥
सुपच सुदर्शनके माता पिता तीसरे जन्ममें नीमा हुए
यहिविधिबहुतदिवसचलिगयऊ।तजितनजन्मबहुरितिनपयऊ
मानुष तन जुलहा कुल दीन्हा । दोउ संयोग बहुरिविधि कीन्हा॥
काशी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलहा होई ॥
नारि गवन लावे मग सोई । जेठमास बरसाइत होई ॥
नारि लिवाय आय मगमाहीं । जलअचवन गहबनिताहीं ॥
ताल नाहिं पुरइन पनवारा । शिशु होय मैं तहैं पगुधारा ॥
तहाँ जस बालकै रहैं पौढाई । करौं कुतूहल बाल स्वभाई ॥
नीमा दृष्टि परी तिहि ठाऊ । देखत दर्श भयो अति चाऊ॥
जिमिरविदरशपडुमबिगसाना । धाय गयो धन रंक समाना॥
धाय गही कर लिया उठायी । बालक लै नीरूपहैं आयी ॥
जुलहा रोष कीन्ह तेहि वारी । बेगि देहु तुम बालक डारी॥
हर्ष गुनावन नारी लाई । तब हम तासो वचन सुनाई॥
१ बरसाइत बटसावित्रीका अपभ्रंश है । यह बटसावित्री व्रत ज्येष्ठ शुद्धपूर्णिमासीको होता है इसकी विस्तारपूर्वक कथा महाभारतमें है । उसी दिन कबीर साहब नीमा और नूरीको मिले थे इस कारणसे कबीर पंथियोंमें बरसाइत महात्म पंथकी कथा प्रचलित है । और उस दिन कबीरपंथी लोग बहुत उत्सव मनाते हैं
रतनाकी कथा
अनुरागसागर
( १०९ )
छन्द
सुनहु वचन हमारे नीमा, तोहि कहहु समझायके ॥ प्रीत पिछली कारणे तुहि, दरस दीन्हो आयके ॥ आपने गृह मोहि लै चलु, चीन्हिके जो गुरु करो ॥ देऊँ नाम दृढाय तो कहै, फन्द यमके नापरो ॥७२॥ सो०-सुनत वचन अस नारि, नीरूत्रास न राखेउ ॥ लै गइ गेह मैझार, काशि नगर तब पहुँचेउ ॥७६॥ नारी न मान त्रास तेहि केरा । रंक धनद सम लै चलि डेरा ॥ जोलहा देखि नारि लौलीना । लेइ चलो अस आयसु दीना ॥ दिवस अनेक रहे तेहि ठाई । कैसहु तेहि परतीत न आई ॥ बहुत दिवस तेहि भवन रहावा । बालक जान न शब्द समावा ॥
सुपुत्र सुदर्शनके माता पिताका बोथे जन्ममें मथुरामें
प्रगट होकर सत्यलोक जाना
त्रिन परतीत काजा नहि होई । दृढ कै गहहु परतीत विलोई ॥ ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा ॥ तजि सो देह बहुरि जो भाई । देह धरी सो देहुँ चिन्हाई ॥ जुलहाकी तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनी ॥ हम तहैं जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमारा मानसों लीन्हा ॥ रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥ ता कहै दीन्हेउ लोक निवासा । अंकुरी पठये निज दासा ॥ पुरुष चरण भेटे उरलाई । शोभा देह हंसकर पाई ॥ देखत हंस पुरुष हरषाने । सुकृति अंश कही मन माने ॥ बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥ जीवनहुः स्वअतिशय भयो भाई । तबही पुरुष सुकृत हंकराई ॥
मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनेका वृत्तांत
( ११० )
अनुरागसागर
आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥ लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥ आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥ सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥ करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥ बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥ जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥
कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर
आना पुरुष वचन
पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥ जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥ दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥ लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥ तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥ वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥ ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥
कबीर वचन
चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥ धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥ तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥ पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥ यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥ पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥ धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥
मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना
अनुरागसागर
( १११ )
धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥ धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥ बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥ निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥ बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥
धर्मराज वचन
बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥ धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥ अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥ निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥
कबीर वचन
धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥ चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥ मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥ आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥ पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥ तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥ चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥ हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥ मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥ तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥
छन्द
आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥ करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥
( ११२ )
अनुरागसागर
मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥ सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥ सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥ पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥
धर्मदास वचन
धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥ मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥ धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥ मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥ अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥ काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥ सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥
कबीर वचन
धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥ धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥ तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥ शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥ दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥ तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥ अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥ ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥ यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥
१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।
कबीरसाहबका चौका करके धर्मदासजीको परवाना देना आरती विधि
अनुरागसागर
( ११३ )
छन्द
चतुर्भुज बंकेज सहतेज, और चौथे तुम अहौ ॥ चार गुरुकडिहार जगके वचन यह निश्चय गहौ ॥ यही चार अंश संसारमें, जीव काज प्रगटाइया ॥ स्वसंवेदसोइनसंग दियो, जेहि सुनि काल भगाइया ॥७४॥
सोरठा-चरोंमें धर्मदास, जम्बुदीपके गुरु साहि ॥ व्यालिस वंश विलास तैं जीव तेहि शरणगहि ॥७८॥
आरतीविधिवर्णन
कबीर साहबका चौका करके धर्मदासको परवाना देना धर्मदास वचन
धर्मदास पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन्ह सुभागा ॥ हे प्रभु ! नहि रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण वरनिन जाई ॥ महिमा अमित अहै तुम स्वामी । केहि विधि बरनों अंतरयामी ॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहिं तुम लीन उबारी ॥ अब चौका भेद कहो मुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुखभामी ॥ जो तुम कहो करौ मैं सोई । तामहैं फेर न परि हैं कोई ॥
कबीर वचन चौकाका साज
धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भागि चले यमराजा ॥ सात हाथको बस्तर लाओ । श्वेत चँदोबा छत्र तनाओ ॥ घर आंगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ ॥ तापर आँटा चौक पुराओ । सवासेर तंदुल ले आओ ॥ स्वेत सिंहासन तहाँ बिछाई । नाना सुगंध धरु तहाँ लगाई ॥ स्वेत मिठाई स्वेतै पाना । पुंगीफल स्वेतहि परमाना ॥ लौंग इलायची कपुर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥
कबीरसाहबका धर्मदासको उपदेश देना
कोई OCR पाठ नहीं।
नारायणदासजीका कबीरसाहबकी अवज्ञा करना
कोई OCR पाठ नहीं।
कोई OCR पाठ नहीं।
कोई OCR पाठ नहीं।
कोई OCR पाठ नहीं।
कोई OCR पाठ नहीं।
द्वादश पन्थका वर्णन
कोई OCR पाठ नहीं।
अनमङ्ग वृत्तका पन्थ ४
कोई OCR पाठ नहीं।
अखिलभङ्ग दूतका पंथ ८
कोई OCR पाठ नहीं।