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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

अनुरागसागर

( ८३ )

तन हमार यदि साजते न्यारा। मम तन नहिं सिरज्यो करतारा॥ शब्द अमान देह है मोरा। परखि गहहु भाज्यो कछु थोरा॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

सुनी वचन अचल भौ भारी । तब रानी अस वचन उचारी॥

रानो इन्द्रमती वचन

हे प्रभु अचरज यह होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई॥

इन्द्र

इन्द्रमती आधीन है कहै, कृपा करहु दयानिधी ॥

एक एक विलोय वरणहु, मोहिते सकलहु विधी ॥

विष्णु सम दूजा नहिं कोई रुद्र चतुरानन मुनि ॥

पंचत्व स्वमीर तनहि, तत्त्वके वश गणगुणी ॥५९॥

सो०-तुम प्रभु गम अपार, बरनो मोते कितभये ॥

भेटहु तृषा हमार अपनो, परिचय मोहि कह॥६२॥

हे प्रभु अस अचरज मोहि होई। अस सुभाव दूजा नहिं कोई॥

कौन आहु कहवाँते आये । तन अचित प्रभु कहैवा पाये॥

कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा । यह सब वरणि कहे मोहि भेवा॥

हम का जानहि भेद तुम्हारा । ताते पूछों यह व्यवहारा ॥

करुणामय वचन

इन्द्रमती सुनो कथा सुहावन । तोहि समुझाय कहों गुणपावन॥

देश हमार न्यार तिहुँ पुरते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुरते॥

तहाँ नहीं यमकेर प्रवेशा । आदि पुरुषको जहवाँ देशा॥

सत्य लोक तेहि देश सुहेला । सत्य नाम गहि कीजे मेला॥

अद्भुत ज्योति पुरुषकी काया । हंसन शोभा अधिक सुहाया॥

आदि पुरुष शोभा अधिकारा । पटतर काहि देहुँ संसारा ॥

द्वीपकरी शोभा उजियारी । पटतर देहुँ काहि संसारी ॥

( ८४ )

अनुरागसागर

यहि तीनों पुर अस नहिं कोई । जाकर तटपर दीजै सोई ॥ चन्द्र सूर यहि देश मंझारा । इन सम और नहीं उजियारा ॥ सत्य लोककी ऐसी बाता । कोटिकशशि इकरोम लजाता ॥ एक रोमकी शोभा ऐसी । और वदनकी वरणों कैसी ॥ ऐसा पुरुष कान्ति उजियारा । हंसन शोभा कहीं बिचारा ॥ एक हंस जस षोडश भाना । अग्र वासना हंस अधाना ॥ तहैं कबहुँ यामिनि नहिं होई । सदा अजोर पुरुष तन सोई ॥ कहा कहां कछु कहत न आवै । धन्य भाग जे हंस सिधवै ॥ ताहि देशते हम चलि आये । करुणामय निज नाम धराये ॥ सतयुग त्रेता द्वापर नामा । तोसन वचन कहीं सुख धामा ॥ युगन युगनमें मैं चलि आवों । जो चेते तेहि लोक पठावों ॥

इन्द्रमती वचन

हे प्रभु औरौ युग तुम आये । कौन नाम उन युगन धराये ॥

करुणामय वचन

सतयुगमें सतनाम कहाये । त्रेता नाम सुनींद्र धराये ॥ युगन युगन हम नाम धरावा । जो चीन्हा तिहिलोक पठावा ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

धर्मदास तेहि कह्यो बुझाई । सतयुग त्रेता कथा सुनाई ॥ सो सुनि अधिक चाह तिन कीन्हा । और बातसु पूछन लीन्हा ॥ उत्पति प्रलय और बहु भाऊ । यम चरित्र सब बरनि सुनाऊ ॥ जेहि विधि षोडश सुत प्रगटना । सो सब भाषा सुनायो ज्ञाना ॥ कूर्म विदार देवी उत्पानी । सो सब ताहि कहा सहिदानी ॥ त्रास अष्टंगी और निकास । जेहि विधि भये मही आकासा ॥ सिंधुमथन त्रय सुत उत्पानी । सबहि कहेउ पाछिल सहिदानी ॥

अनुरागसागर

( ८६ )

जेहिविधिजीवनजमठगिराखा । सो सब ताहि सुनायउ भाषा ॥ सुनत ज्ञान पाछिल भ्रम भागा । हरषि सो चरण गहे अनुरागा ॥

इन्द्रमती वचन

जोरि पाणि बोली बिलखायी । प्रभु यमते लेहु छुड़ाई ॥ राज पाट सब तुम पर बारों । धन सम्पति यह सब तजि डारों ॥ देहु शरण मुहिं दीनदयाला । बंदिछोर मुहिं करहु निहाला ॥

कृष्णामय वचन

इन्द्रमती सुन वचन हमारा । छोरों निश्चय बंदि तुम्हारा ॥ चीन्हेउ मोहिं परतीत ददाना । अब देहुँ तोहि नाम परवाना ॥ करहु आरती लेहु परवाना । भागे यम तब दूर पयाना ॥ चीन्हों मोहि करो परवाती । लेहु पान चालु भौ जल जाती ॥ आनहु जो कछु आरती साजा । राजपाट कर मोहि न काजा ॥ धन सम्पति कछु मोहि न भावा । जीव चितावन यहि जग आवा ॥ धन सम्पति तुम यहवों लायी । करहु सन्त सम्मान बनायी ॥ सकल जीव हैं साहिब केरा । मोह वश जिय परें अँधेरा ॥ सब घट पुरुष अंश कियो बासा । यहि प्रगट कहिं गुप्त निवासा ॥

छन्द

सब जीव हैं सतपुरुषका वश, मोह भ्रम विगानहो ॥ यमराजको यह चरित सब, भ्रम जाल जग परधानहो ॥ जिव काल वश लरत मोसे भ्रम वश मोहि चीन्हई ॥ तजिसुधाकीन्होनेह विषसे, छोड़ि घृत अँचवे मही ६० ॥ सो ०-कोइइ कविरला जीव, परसि शब्द मोहि चीन्हई ॥ धाय मिले निज पीव, तजे जारको आसरो ॥ ६३ ॥

इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुण बानी ॥

( ८६ )

अनुरागसागर

मोहि अधमको तुम सुख दीन्हा। तुव प्रसाद आगमगम चीन्हा ॥ हे प्रभु चीन्ह तोहि अब पाहू । निश्चय सत्यपुरुष तुम आहू ॥ सत्यपुरुष जिन लोक सवारा । करेहु कृपा सो मोहि उदारा ॥ आपन हिरदै असहम जाना । तुमते अधिक और नहि आना ॥ अब भाषहु प्रभु आरती भाऊ । जो चाहिये सो मोहि बताऊ ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

हे धर्मनि सो ताहि सुनावा । जस खेमसरि सो भाषेउ भावा ॥ चौका कर लेवहु परवाना । पीछे कहों अपन सहिदाना ॥ आने उसकलसाज तब रानी । चौका बैठि शब्दध्वनि ठानी ॥ आरति कर दीन्हा परवाना । पुरुष ध्यानसुमिरण सहिदाना ॥ उठि रानी तब माथ नवायी । ले आज्ञा परवानी पायी ॥ पुनि रानी राजहि समुझावा । हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा ॥ गहो शरण जो कारज चाहो । इतना वचन मोर निरवाहो ॥

राजा चन्द्र विजय वचन

तुम रानी अरधंगी सोई । हम तुम भक्त होय नहि होई ॥ तोरि भक्ति कर देखो भाऊ । किहिविधि मोहि लेहु सुत्ताऊ ॥ देखो तोरि भक्ति परतापा । पहुँचै लोक मिटे संतापा ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

रानी बहुरि मोहिपहँ आयी । हम तिहिकाल चरित्र लखाई ॥ रानी आई हमरें पास । तासों कियो वचन परकासा ॥

कृष्णामय वचन

सुनु रानी एक वचन हमारा । कालहु कला करे छल धारा ॥ काल ब्याल है तोपहँ आयी । डसे तोहि सो देउँ बतायी ॥ ता कह शिष्य कीन्ह मैं जानी । डसे काल तक्षक है आनी ॥ तब हम तो कहँ मंत्र लखायी । काल गरल तब दूर परायी ॥

अनुरागसागर

( ८७ )

दीन्हों शब्द विरहुली ताहीं । काल गरल जेहि व्यापे नाहीं॥ पुनियम दूसर छल तोहि ठानी । सो चरित्र मैं कहों बखानी ॥ छलकर यम आये तुम पासा । सो तुहि भेद कहों परगासा ॥ हंसवर्ण वह रूप बनायी । हमसम ज्ञान तोहि समझायी ॥ तुमसन कहे चीन्ह मोहिरानी । मरदन काल नाम ममज्ञानी ॥ यहि विधि काल ठगे तोहि आयी । काल रेख सब देउ बतायी ॥ मस्तक छोट कालकर जानू । चक्षु गुंजनको रंग बखानू ॥ काल लक्ष मैं तोहि बतायी । और अंग सब सेत रहायी ॥

इन्द्रमती वचन

रानी चरण गहे तब धायी । है प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥ यह तो देश आही यमकेरा । लै चलु लोक मिटे झकझोरा ॥ यह तो देश कालकर थानी । हे प्रभु लै चलु देश अमानी ॥

करुणामय वचन

तब रानीसों कहेउ बुझाई । वचन हमार सुनो चितलाई ॥ अब तोर तिनका यमसों दूटा । परिचय भयो सकल भ्रम छूटा ॥ निशिदिन सुमरो नाम हमारा । कहा करे यह धर्म लबारा ॥ जब लगि ठेका पूरे नाई । तब लगि रहो नाम लौ लाई ॥

छन्द

सुमरु नाम हमार निशिदिन, काल तो कहैं जब छले ॥ टीका पुरे नाहिं जौलों तौलों जीव नाहीं चले ॥ काल कला प्रचंड देखो, गजरूप धर जग आवई ॥ देखि केहरि गजत्रास माने, धीर बढ़रि न लावई ॥ ६१ ॥ सो०—गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ॥ रोप रहो तुम ढाल, काल खड़ व्यापे नाहीं ॥ ६४ ॥

( ८८ )

अनुरागसागर

इन्द्रमती वचन

हे साहिब मैं तुम कहैं जानी । वचन तुम्हार लीन्ह सिर मानी ॥ विनती एक करों तुहि स्वामी । तुम तो साहिब अंतरयामी ॥ काल ब्याल दुष्ट मोहि सताई । अरु पुनि हंसरूप भरमायी ॥ तब पुनि साहिब मोपहैं आज्ञ । हंस हमार लोको लै जाऊ ॥

करुणामय वचन

कह ज्ञानी सुन रानी बाता । तुमसों एक कहों विख्याता ॥ काल कला धरती पहैं आयी । नाना रंग चरित्र बनायी ॥ तोरों ताहि मान अपमाना । मोहि देखि तब काल पराना ॥ तेहि पीछे हम तुम लग आवैं । हंस हमार लोक पहुँचावैं ॥ शब्द तोहि हम दीन्ह लखाई । निशिदिन सुपरी चित्त लगायी ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

इतना कह हम गुप्त छिपाया । तक्षक रूप काल हो आया ॥ चित्रसार पर तक्षक आया । रानी केर तहैं पलंग रहया ॥ जबही रात बीत गई आधी । रानी उठि चली सेवा साधी ॥ रानी तब कहैं सीस नवायी । चली तबै महलन कहैं आयी ॥ सेज आय रानी पौढ़ायी । डसेउ ब्याल मस्तक महैं जायी ॥

इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती अस वचन सुनायी । तक्षक डसेउ मोहि कहैं आयी ॥ सुन राजा व्याकुल है धावा । गुणी गारुणी वेगि बुलावा ॥ राय कहे मम प्राणपियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥ तक्षक गरल दूर हो आयी । देहुँ परगना तोहि दिवायी ॥

इन्द्रमती वचन छन्द

शब्द विरहुली जपेउ रानी, सुरति साहब राखिहो ॥ वैद गारुणि दूर भाग्या, दूर नरपति नाहि हो ॥

अनुरागसागर

( ८९ )

मन्त्र मोहि लखाय सतगुरु, गरल मोहि न लागई ॥ होत सूर्यप्रकाश जेहिक्षण, अन्ध घोर नशावई ॥६२॥ सोरठा-ऐसे गुरु हमार, बार बार विनती करौं ॥ ठाढ़भयी उठिनार, राजा लखि हरषित भयो ॥६५॥

यमदूतवचन

चल्यो दूत तब उहवां जायी । जहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देश रहायी॥ कहे दूत विषतेज न लागा । नाम प्रतापबंध लो भागा ॥

विष्णुवचन

कहे विष्णु सुन हो यम दूता । सेतहि अंग करो तुम पूता ॥ छक करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥ कीन्हो दूत सेत सब अंगा । जलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥

यमदूतवचन

रानीसों अस वचन प्रकाशा । तुम कस रानी भई उदासा ॥ जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीक्षा मन्त्र तोहि हम दीन्हा ॥ ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदो काल करौं पिसमानी ॥ तक्षक काल होय तोहि खायी । तब हम राख लीन्ह तोहि आयी ॥ छोड़हु पल्लंग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बड़ाई ॥ अब हम लेन तोहि कहैं आवा । प्रभुके दर्शन तोहि करावा ॥

इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती तब चीन्हेउ रेखा । असकछु साहिब कहेउ विशेषा ॥ तीनों रेख देख चक माहीं । जर्द सेत अरु राता आहीं ॥ मस्तक ओछ देख पुनि ताको । भयो प्रतीत वचनको साको ॥ जाहु दूत तुम अपने देशा । अब हम चीन्हेउ तुम्हारो भेसा ॥ काग रूप जो बहुत बनाई । हंस रूप शोभा किमि पाई ॥ तस हम तोरा रूप निहारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥

( ९० )

अनुरागसागर

यमदूतवचन

यह सुन दूत रोष बड़ कीन्ह। इन्द्रमतीसों बोले लीन्ह। ॥ बार २ तो कहैं समुझावा । नाहिंन समुझत मती हिरावा ॥ बोला वचन निकट चलिआवा । इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥ थाप चलाय सुमुखपर मारा । रानी खसि परि भूमि मझारा ॥

इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती तब सुमिरण लाई । हे गुरु ज्ञानी होहु सहाई ॥ हमकहैं काल बहुत विधिआसा । तुमसाहिब काटो यमफाँसा ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सुनत पुकार सुनि रहो न जायी । सुनहु धर्मनि यह मोर सुभायी ॥ रानी जबही कीन्ह पुकारा । तब छिन मैं तहांहि पगुधारा ॥ देखत रानी भयी हुलासा । मनते भाग्यो कालको त्रासा ॥ आवत हमरे काल पराया । भयी शुद्ध रानीकी काया ॥

इन्द्रमतीवचन

पुनि कह इन्द्रमती कर जोरी । हे प्रभु सुनु विनती एक मोरी ॥ चीन्हि परी मोहियमकी छाहीं । अब यहि देश रहब हम नाहीं ॥ हे साहिब लै चलु निज देशा । तहवाँ है बहु काल कलेशा ॥ इहि विधि कही भली उदासा । अबहीं लै चलु पुरुषके पास ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

प्रथमहिं रानी कीन्हो संग। मेटचो काल कठिन परसंगा ॥ तबही टीका पूर भराया । ले रानी सतलोक सिधाया ॥ ले पहुँचायो मान सरोवर । जहवां कामनि करहिं कतोहर ॥ अमी सरोवर अमी चखायो । सागर कबीर पांव परायो ॥ तेहि आगे सुरतिको सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥ लोक द्वार ठाढ़े तब कीनी । देखत रानी अति सुख भीनी ॥ हंस धाय अंकमें लीन्ह। गावहिं मंगल आरति कीन्ह ॥

अनुरागसागर

( ११ )

सकल हंस कीना सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥ मलतुम छोड़ेउ कालका फंदा । तुम्हारो कष्ट मिटचो दुख द्रंदा ॥ चलो हंस तुम हमारे साथा । पुरुष दरश करिनावहु माथा ॥ इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवें अब तोरे ॥ इन्द्रमती अरु हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥ चलत हंस सब अस्तुति लावें । अब तो दरश पुरुषको पावें ॥ तब हम पुरुष सनविनती लावा । देहु दरस अब हंस ढिग आवा ॥ देहु दरश तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥ बिकस्यो पुहुष उठी असबानी । सुनहु योग संतायन ज्ञानी ॥ हंसन कहैं अब आव लिवाई । दरश कराइ लेउ तुम आई ॥

छन्द

ज्ञानीखाउ हंस लग तब, हंस सकला ले गये ॥ पुरुषदर्शन पाय हंसा, रूप शोभा तब भये ॥ करहिं दंडवत हंस सबही, पुरुष पहुँ चित लाइया ॥ अमीफल तब चार दीन्हों, हंस सब मिल पाइया ॥ ६३ ॥ सो०—जस रविके परकाश, दरश पायपंकज खुले ॥ तैंसैं हंस विलास, जन्म जन्म दुखमिटि गयो ॥ ६६ ॥

इन्द्रमतीको लोकमें पहुँच पुरुष और करणामयको एकही रूपमें देखकर चकित होना

पुरुष कांति जब देखेउ रानी । अद्भुत अमी सुधाकी खानी ॥ गदगद होय चरण लपटानी । हंस सुबुद्धि सुजन गुणज्ञानी ॥ दीनों शीश हाथ जिव मूला । रविप्रकाश जिमि पंकज फूला ॥

इन्द्रमती वचन

कह रानी तुम धनिकरुणामय । जिमिभ्रममेटि आनियहिठामय

( ९२ )

अनुरागसागर

पुरुष वचन

कहा पुरुष रानी समझायी । करूणामय कहँ आनु बुलाई॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

नारि धाय आई मो पासा । महिमा देखि चकित भये दासा॥

इन्द्रमतीवचन

कह रानी यह अचरज आही । भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥ जे कोइ कला पुरुष कहँ देखा । करूणामय तन एक विशेषा॥ धाय चरण गह हंस सुजाना । हे प्रभु तब चरित्र सब जाना॥ तुम सतपुरुष दास कहलाये । यह शोभा कस कहाँ छिपाये॥ मोरे चित यह निश्चय आई । तुमहि पुरुष दूजा नहिं भाई॥ सो मैं आय देख यहि ठाई । धनसमरथ मुहिं लिया जगाई॥

इन्द्रमती स्तुति करती है । छन्द

तुम धन्य हो दयानिधान सुजान नाम अर्चितयं ॥ अकथ अविचल अमर अस्थित अनघ अजसु आदिये ॥ असंशय निःकाम वाम अनाम अटल अखंडितं ॥ आदि सबके तुमहि प्रभु हो सर्व भूतसमीपतं ॥ ६४ ॥ सो ०-मोपर भये दयाल, लियहु जगाई जानि निज ॥ काटेहु यमको जाल, दीन्हो सुखसागर करी ॥ ५७ ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

संपुट कमल लगे तेहि बारा । चले हंस निज दीप मैझारा ॥

करूणामय ( ज्ञानी ) वचन इन्द्रमतीप्रति

ज्ञानी बूझें रानी बाता । कहो हंस तुम्हरो विख्याता ॥ अब दुख द्रंद तोर मिटि गयऊ । षोडश भानु रूप पुनि भयऊ ॥ ऐसे पुरुष दया तोहि कीन्हा । संशय सोग मेंटि तुव दीन्हा ॥

अनुरागसागर

( ९३ )

इन्द्रमतीका अपने पति राजा चन्द्रविजयको लोकमें लानेके लिये विनती करना इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती कह दोउ कर जोरी । हे साहिब इक विनती मोरी ॥ तुम्हरे चरण भागते पायी । पुरुष दर्श कीन्हा हम आयी ॥ अंग हमार रूप अति सोही । इक संशय व्यापे चित मोही ॥ मो कहैं भयो मोह अधिकारा । राजापति आहि हमारा ॥ आनहु ताहि हंसपति राई । राजा मोर कालमुख जाई ॥

कृष्णा वचन

कहे ज्ञानी सुन हंस सुजाना । राजा नहिं पाये परवाना ॥ तुम तो हंसरूप अब पाया । कौनकाज कहैं राव बुलाया ॥ राजा भाव भक्ति नहिं पाया । सत्त्वहीन भव भटका खाया ॥

इन्द्रमती वचन

हे प्रभु हम जग माँह रहेऊ । भक्तितुम्हारि बहुत विधि करेऊ ॥ राजा भक्ति हमारी जाना । हम कहैं बरजेउ नहीं सुजाना ॥ कठिन भाव संसार सुभाऊ । पुरुष छोड़ कहु नारि रहाऊ ॥ सब संसार देहि तिहि गारी । सुनतहि पुरुष डार तेहि मारी ॥ राज काज अतिमान बड़ाई । पाखंड क्रोध और चतुराई ॥ साधु संतकी सेवा करऊ । राजकेर त्रास ना डरऊ ॥ सेवा करौ संतकी जबहीं । राजा सुनि हरषित हो तबहीं ॥ जो मोहिं तजि न देता राजा । तो प्रभु मोर होत किमि काजा ॥

छन्द

रायकी हम हती प्यारी, मोहिं कबहुँ न बरजेऊ ॥ साधु सेवा कीन्ह नित हम, शब्द मारग चीन्हैऊ ॥ चरण मो कहैं मिलत कैसे, मोहि बरजत रायजो ॥ नामपाननमिलत मोकहैं, कैसे सुधरत काजजो ॥ ६५ ॥

( ९४ )

अनुरागसागर

सो०-धन्य राय सुज्ञान, आनहु ताहि हंस ॥ तुम गुरुदयानिधान, भूपति बंद छुड़ाइये ॥६८॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सुन ज्ञानी बहुतै विहँसाये । चले तुरंग बार नहिं लाये ॥ गढगिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधी नियराया ॥ घेरेचो ताहि लेन यमराई । राजहि देत कष्ट बहुताई ॥ राजा परे गाढ़ महाँ आया । सतगुरु कहै तहाँ गुहराया ॥ घोड़े नृप नाहीं यमराई । ऐसे भक्ति चूक है भाई ॥ भक्ति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर यम करे विहाला ॥ चन्द्रविजयका करगहि लीन्हा । तत्क्षण लोक पयाना दीन्हा ॥ रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥

इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती के सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥

राजा चन्द्रविजय वचन

राय कहैं सुनु हंस सुजाना । वरण तोर षोडश शशिमाना ॥ अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहाँ तोहि मैं नारी ॥ तुम तो भक्त कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥ धन्य गुरु अस भक्ति दृढ़ाई । तोरि भक्ति हम निज घर पाई ॥ कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥ हम तो राजकाज मनलाया । सतगुरु भक्ति चीन्ह नहिं पाया ॥ जो तुम मोरि होत ना नारी । तो हम जात नरककी खानी ॥ तुवगुण मोहि वरणि ना जाई । धनगुरु धन्य नारि हम पाई ॥ जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैसे मिले सकल संसारी ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

मुनत वचन ज्ञानी वहसायी । चन्द्रविजय कहैं वचन मुनायी ॥

सुपच सुदर्शनकी कथा

अनुरागसागर

( १५ )

कहणा मय वचन

सुनो राय तुम नृपति सुजाना । जो जिव शब्द हमारा माना ॥ ते पुनि आय पुरुष दरबारा । बहुरि न देखे वह संसारा ॥ हंस रूप होवे नर नारी । जो निजमाने बात हमारी ॥ पुरुष दर्श नरपति चितलायी । हंस रूप शोभा अतिपायी ॥ षोडश भानु रूप नृप पावा । जानुमयंकम ढार बनावा ॥

धर्मदासवचन छन्द

धर्मदास विनती करे, युग लेख जीव सुनायऊ ॥ धन्य नाम तुम्हारा साहिब, राय लोक समायऊ ॥ तत्त्वभाव न गहेउ राजा, भक्ति तुव निजठानिया ॥ नारिभक्ति प्रतापते, यमराजसै नृप आनिया ॥६६॥ सो०-धन्यनारिकोज्ञान, लीन्ह बुलायस्व नृपति कहैं ॥ आवागमन नशान, जगमें बहुरि न आइया ॥६९॥ ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परबीना ॥ कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पतिनागर ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

धर्मनि पुनि आये जगमाहीं । रानी पति ले गये तहांहीं ॥ राख्यो ताहि लोक मंझारा । तत छिन पुनि आयउ संसारा ॥ काशी नगर तहां चलि आये । नाम सुदरशन सुपच जगाये ॥

सुपच सुदर्शनकी कथा

नाम सुदर्शन सुपच रहाई । ता कहे हम सतशब्द दृढाई ॥ शब्द विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि शब्दके मेला ॥ निश्चय वचन मान तिन्ह मोरा । लखि परतीत वंदि तिहि छोरा ॥ नाम पान दियो मुक्ति सँदेशा । मेटचो सकल काल कलेशा ॥

कलियुगमें कबीरसाहबके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत

( ९६ )

अनुरागसागर

शब्द ध्यान तेहि दीन्ह हढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई॥ सतगुरु भक्ति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई॥ तात मात तेहि हर्ष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा॥ धर्मनि यह संसार अँधेरा । विनु परिचय जिव यमको चेरा॥ भक्ति देखि हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाईं ॥ प्रगट देखि चीन्हे नहिं मूढ़ा । परे कालके फन्द अगूढ़ा ॥ जैसे श्वान अपावन रांचेउतिमिजगअमीछोड़िविषखांचेउ नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिन पुनि कीन्ह यज्ञको साजा ॥ बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते यज्ञरचनके चित दीन्हा ॥ कृष्ण केर जब आज्ञा पाई । तब पांडव सब साज मँगाईं ॥ यज्ञकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हँकारी ॥ पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिंकाला ॥ घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञको फल तब पूरन पावे ॥ संन्यासी वैरागी झारी । आवे ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥ भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहिं जेवाईं ॥ इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घण्ट न बाजा राय लजावा ॥ जबहि घण्ट न बाज अकाशा । चकित भयोराय बुधिनाशा ॥ भोजन कीन सकल ऋषिराया । बजा न घण्ट भूप भ्रम आया ॥ पांडव तबहिं कृष्णपह गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥

युधिष्ठिर वचन

करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घण्ट नहिं बाजा ॥

कृष्ण उत्तर

कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोइ न भोजन पाया ॥

१ “शब्द ध्यान” के बदले किसी प्रतियोगी “ सुरति ध्यान ” लिखा है ।

अनुरागसागर

( १७ )

युधिष्ठिरवचन

चकित भै तब पाण्डव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ॥ अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥

कृष्ण वचन

सुपच सुदर्शनको ले आवो । आदरमान समेत जिमावो ॥ सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

कृष्ण आज्ञा जब अस पयऊ । पाण्डव तब ताके ढिग गयऊ॥ सुपच सुदर्शनको ले आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाये ॥ भूपभवन भोजन कर जबहीं । बजा आकाशमें घंटा तबहीं ॥ सुपच भक्त जब त्रास उठावा । बाजो घण्ट नाम परभावा ॥ तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नाश यम हाट विकानी ॥ भक्त जीव कहैं काल सताये । भक्त अभक्त सबन कहैं खाये ॥ कृष्ण बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बंधु घात पांडव तब कीन्हा ॥ पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहिं यज्ञ करावा ॥ ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजि हिमालय तिन्हैं लगावा ॥ चार बंधु सह द्रौपदि गहेऊ । उबरे सत्य युधिष्ठिर रहेऊ ॥ अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस कीन्हा अपमाना ॥ बलि हरि चन्द्र करण बड़ दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥ जिव अचेत आशा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥ कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥ मुक्ति जान जिव आशा लावै । आशा बांधि कालमुख जावै ॥ सब कहैं काल नचावै नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं बाचा ॥ जो रक्षक तेहि खोजे नाहीं । अनचीन्हे यमके सुख जाहीं ॥ बार बार जीवन समुझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥

( ९८ )

अनुरागसागर

अस यम बुद्धि हरी सब केरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥ सत्य शब्द कोइ परखे नाहीं । यम दिशि होय लरै हम पाहीं ॥ जबलगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जन्म मरण नहिं भेटे ॥ पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जाई । कुत्रिम नामते यम धरिखाई ॥ पुरुष नाम परवाना पाये । कालहि जीत अमर घर जावे ॥

चन्द्र

सत नाम प्रताप धर्मनि, हंस लोक सिधार्वई ॥ जन्ममरणको कष्ट भेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥ पुरुषकी छबि हंस निरखहि, लहे अति आनंद घना ॥ अंश हंस मिलिकरै कुतूहल, चन्द्र कुमुदिनि सँग बना ६६ सो०—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हर्षई ॥ तैसह हंस सुख पाव, पुरुष दर्शके पावते ॥ ७० ॥ नहिं मलीन सुखभाव, एक प्रभाव सदा उदित ॥ हंस सदा सुख पाव, शोक मोह दुख क्षण कनहि ॥ ७१ ॥ जबै सुदर्शन देका पूरा । ले सत लोक पठायो सूरा ॥ मिले रूप शोभा अधिकारा । हंसन संग कुतूहल सारा ॥ षोडश भानु रूप तब पावा । पुरुष दर्श सो हंस जुड़ावा ॥

धर्मराय वचन

हे साहिब इक बिनती मोरा । खसम कबीर कहु बंदी छोरा ॥ भक्त सुदरशन लोक पठायी । पीछे साहिब कहाँ सिधायी ॥ सो सतगुरु कहो सुदि संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥

कबीर वचन

अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसों कहौं अलग व्यवहारा ॥ द्रापर गत कलियुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥ धर्मराय कहैं देख्यो आई । मोहि देखि यम गयो मुझाई ॥

अनुरागसागर

( ९९ )

धर्मराय वचन

कहे धर्म कस मोहिं दुखावहु । भन्छ हमार लोक पहुँचावहु॥ तीनों युग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा॥ हारी वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुड़ावन लीन्हा॥ और बंधु जो आवत कोई । छिनमहैं ताकहैं खाँव विलोई॥ तुमते कछु न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥ अब तुम फेर जाहु सगमाहीं । शब्द तुम्हार सुनै कोउ नाहीं॥ करम भरम मम असकै ठाटा । ताते कोई न पावै वाटा ॥ घर घर भरम भूत उपजावा । धोखा दे दे जीव नचावा ॥ भरत भूत है सब कहैं लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥ मद्य मांस खावै नर लोई । सर्व मांस प्रिय नरको होई ॥ आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांम मद्य सब मानुष त्रासा ॥ चण्डी जोगिन भूत पुजाओं । यही भ्रम है जग जहै माडाओं॥ बांधि बहुफंदहिं फन्द फन्दाओ । अंतकाल कर सुधि बिसराओ॥ तुम्हरी भक्ति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहौं बुझाई ॥

ज्ञानी वचन

धर्मरायते बड़ छल कीन्हा । छल तुम्हार सकलो हम चीन्हा॥ पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥ पुरुष मोहि जो आज्ञा देही । तो सब होय नाम सनेही ॥ ताते सहजहिं जीव चेताऊँ । अंकुरी जीव सकल मुकताऊँ॥ कोटि फन्द जो तुम रचिराखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥ प्रकट कला जो धरि जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥ जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अड़ोल अमोलै॥ जो जियरा अंकुरी शुभ होई । शब्द हमार मानि है सोई ॥ अंकुरी जीव सकल मुकताओं । फन्दा काटि लोक लैजाओं ॥ काटि भरम जो देहौं ताही । भरम तुम्हार मानि हैं नाहीं ॥

धर्मरायका बाट रोकना और कबीर साहबका उसे परास्त कर आगे बढ़ना

( १०० )

अनुरागसागर

छन्द

सत्य शब्द दिदाय सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहौं ॥ छलतोर सब चिन्हाइ तवहीं, नामबल जियतारिहौं ॥ मनवचनसत्य जो मोहि चीन्ही, एकतत्त्वलौं लाइहौं ॥ तवसीस तुम्हारे पांव देहीं, अमललोक जिव आइहै ६८ सो ०-मर्दहि तोरा मान, सूरग हंस सुजान कोइ ॥ सत्यशब्द सहिदान, चीन्हहि हंसहरषअती ॥७२॥

धर्मराय वचन

कहै धर्म जीवन सुखदाई । बात एक सुहि कहो बुझाई ॥ जो जिव रहे तुम्हैं लौं आई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥ दूत हमार ताहि नहिं पावै । मूर्छित दूत मोहि पहीं आवै ॥ यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥

ज्ञानीवचन

सुनहु धर्म जो पूछेहु मोही । सो सब हाल कहो मैं तोहीं ॥ सुन धर्म तुम सत सहिदानी । सोतोसत्य शब्द आहि निर्वानी ॥ पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रकट नामसत हंस बखाना ॥ नाम हमार हंस जो गहई । भवसागर सो सो निरबहई ॥ दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥

धर्मराय वचन

कहै धर्म सुनु अन्तर्यामी । कृपा करो अब मोपर स्वामी ॥ यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥ वीरा अंक गुप्त गन आऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥ केहि कारण तुम जाहु संसारा । सोइ कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥ हमहूँ जीवन शब्द चेतायब । पुरुषलोक कहैं जीव पठायब ॥ मोहिं दास आपन कर लीजै । शब्द सार प्रभु मोकहैं दीजै ॥

निरंजनका कबीर साहबसे नामभेद पूछना

अनुरागसागर

( १०१ )

ज्ञानी वचन

सुनहु धर्म तुम कस छल करहु । प्रगट सुदास गुप्त छल धरहु ॥ गुप्त भेद नहिं देहौं तोहीं । पुरुष अवाज कही नहिं मोहीं ॥ नाम कबीर मोर कलिमाहीं । कबीर कहत यम निकट न जाहीं

धर्मराय वचन

कहे धर्म तुम मोहिं डुरै हो । खेल एक पुन हमहु खेलै हो ॥ ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेव संग लाई ॥ तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब

ज्ञानी वचन

अरे काल तू प्ररुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥ जो जिव होई है शब्द सनेही । छल तुम्हार नहिं लागै तेही ॥ जौहरी हंस लेहिं पहिचानी । परखि हैं ज्ञान ग्रंथ मम वानी ॥ जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

यहि सुनत धर्मराय गहु मौना । है अन्तर्धान गयो निज भौना ॥ धर्मनि कठिन काल गति नन्दा । छल बुध कै जीवन कहैं फन्द्रा ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगल चरित्र कहि समझाओ ॥

जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त

कबीर वचन धर्मदासप्रति

राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ेसेको महिपाला ॥

सदगुरु वचन

राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडप काज युगति सो कहई ॥ कृष्ण देह छांड़ी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥ स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥ मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपह मैं आयउ यहि काजा ॥

( १०२ )

अनुरागसागर

राजा यहि विधि सपना पाई । ततक्षण मंडप काम लगाई॥ मंडप उठा पूर्ण भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा॥ पुनि जब मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥ क्षणमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥ मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहिं लेत डुबायी॥ हारा नृप करि यतन उपायी । हरिमंदिर तहैं उठे न भाई ॥ मंदिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मन माहिं सम्हारी॥ हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहाँ हम जाई॥ आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीव न मोही चीन्हा ॥ पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहैं बनायउ जाई ॥ इन्द्रदमन तब सपना पावा । जहो राय तुम काम लगावा॥ मंडप शंक न राखो राजा । इहवाँ हम आये यहि काजा॥ जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु वचन हमारा॥ राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चल आयो॥ सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोधचित धारा॥ उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहम ना पावे॥ उमंगेउ लहर अकाशे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी॥ दरश हमार उदधि जब पाई । अति भय मान रहो ठहराई॥

छन्द

रूप धारयो विप्रको तब, उदधि हमपहैं आइया ॥ चरण गहिके माथ नायो, सर्म हम नहिं पाइया ॥

उदधि वचन

जगन्नाथ हम भोर स्वामी, ताहि ते हम आइया ॥ अपराध मेरो क्षमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥ ६९ ॥