कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 499, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(५५)
अब यह दया करो सुखदाई । दोउ सेवक कै दरशन पाई ॥ बड़ इच्छा उन्ह दरशन केरा । हो प्रभु हम आहीं तुव चेरा ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्म निदरशन तिन्ह पैहौ । लीला देखि थकित होइ जैहौ ॥ आप तीनरूप प्रकट दिखावा । एक तीन होय एक समावा ॥ धरमदास अचरज है रहेऊ । समिता होय युगल पद गहेऊ ॥ लीला देखि चकित भये दासा । पुनि विनती एककीन्ह प्रगासा ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु अविगति कला तुम्हारी । हम हैं कीट जीव व्यभिचारी ॥ सत्यलोक तुम्ह वरणि सुनावा । सोभा पुरुष ईसन सतभावा ॥ कैसन देश राज वह आही । चित इच्छा प्रभु देखन ताही ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास यह निरघिन काया । यहितन पुरुष दरश किमि पाया ॥ तन ठीका जब पुरि है आई । सत्यलोक तब देखहु जाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गहि चरण निहोरा । हे प्रभु तृषा मिटावहु मोरा ॥ चरण टेकि प्रभु विनवौ तोहीं । पुरुष दरश विनु कल नहिं मोहीं ॥
कबीर साहिबका फिर अन्तर्धान हो जाना और धर्मदास
साहबका विकल होना
गुप्त भये प्रभु अविगति ताता । धर्मदास मुख आवै न बाता ॥
धर्मदासविलाप
मैं मतिहीनकुमति मुहिलागा । मोहिंसमको जग आहि अभगा ॥ मैं मूरख प्रतीति न कीन्हा । अस साहेब कहैं मैं नहि चीन्हा ॥ अब कौने विधि दरशन पाऊँ । दरशन विनु मैं प्राण गवाऊँ ॥ चरणोदक विनु करौं न आसा । तजौं शरीर कहैं धर्मदासा ॥ दिवस सात लगि अन्न न खावा । भजन अखण्ड नाम लौलावा ॥