कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें(५६)
ज्ञानप्रकाश
कबौर साहिबका पांचवीं बार फिर धर्मदासजीको दर्शन देना
सतयै दिन प्रभु प्रकट दिखाये । धर्मदास पद गहि अकुलाये ॥ धरहिं न श्वामहिनिपट अधीरा । परे चरण महाँ क्षीण शरीरा ॥ कर गहि साहब तबहिं उठावा । शीश हाथ दै अंक मिलावा ॥ धर्मदास चरणोदक लीन्हा । चरण पखारि आचमन कीन्हा ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मदास प्रमाद कछु पाओ । करि प्रसाद तव मोपहैं आओ ॥ छन्द-चित्तसकुचिधर्मनिविछुरन गुनि सर्वत्र सब हौरा किये ॥ कछु जाइ अलप प्रमाद ततक्षण तृण जल अंचवन लिये ॥ पुनि वेगि समरथ निकट आये सकुचि चित ठाढे भये ॥ अनुशासनो कहु धर्मनि कहा चित चिन्ता भये ॥
धर्मदास वचन
दोहा-धर्मदास कह नाइ शिर, सुनु प्रभु अगम अपार ॥ सात दिवस कहवों रहे, कौन दिशा पगु ढार ॥
सतगुरु वचन
सोरठा-धर्मनि सुनु चित लाय, जौन दिशा हम गौन किये । कालिजर पहुँचे जाय, तहाँ पुनि शब्द प्रकाशेउँ ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हो साहेब कै जीव परमोधा । कौन शब्द सो आन समोधा ॥ आरति चौका नरियर मोरचो । कै जीवन यमते तृणतोरचो ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि सुनहु ताहि सहिदाना । तहाँकेजीवहिंनहिंदीन्ह प्रवाना ॥ आरति चौका तहाँ न कीना । नहीं तहाँ नरियर मोरु प्रवीना ॥ वचन बंध जीवनकहैं कियेऊँ । साखी शब्द रमैनी दियेऊँ ॥ कहिआयेऊँतहैंवचन ठिकाना । धर्मदास सो न लियेहु प्रवाना ॥