कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें(७२)
अमरसिंह बोध
छन्द चर्चरी
मोहि कहा जानि दरशन दिये प्रभु गुप्त पुनि काहे भये ॥ हग पलक देत बिलंब नाही कवन दिशि कहँवा गये ॥ हमहीं अभागी कीन्ह सतगुरु दरस देके छिप रहे ॥ कैसे धरूँ मन धीर तबलग दरश तुम ना देखिहे ॥
सोरठा-भये अभाग मुहि जान, दरश देहेके छिप रहे ॥
नहीं करूँ जलपान, जबलग दरश न देखहुँ ॥
चौपाई
दिवस पाँच तब ऐसे बीता । निपट राय उर बाढ़ी चींता ॥ सुनी खबर तब पंथ चलि आये । तिन राजाको आन उठाये ॥ ले झारी मुख मंजन कीना । संत चरण चितवहु विधिदीना ॥ सतगुरु दरश दिये तेहि वारा । महल मांहि कीनो उजियारा ॥ तहां जाइ जब ठाडे भयऊ । राजा चरण धाय तब गह्यऊ ॥ हमहि सनाथ किये प्रभुराई । हम निज सेवक तुमरे आई ॥
सतगुरु वचन
ज्ञानी कहे सुनो हो राई । यमफांसीते लेहों छुड़ाई ॥ सब जग परचो कालके फंदा । बहुविधि तिनको बांधे बंधा ॥ नेम धर्म कुल कर्म लगाये । ये फंदा सब जगत फँदाये ॥ जो कोइ हंसा होय सुभागी । काल फांसते बचिहै भागी ॥ धर्मकाल ताको नहि पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥ साखी-शब्द सुरत युग बांधई, कर्म भर्म दे छोर ॥ हंस गति जब आवई, कहा करे यम चोर ॥
अमरसिंह वचन-चौपाई
हे साहेब जो आयेसु पाऊँ । तो रानीको वचन सुनाऊँ ॥ अबके सतगुरु जाहु दुराई । तो हमकूँ नहि जीवत पाई ॥