भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(१०६)

बीरसिंह बोध

पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥ राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥ बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥ ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥ राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥ पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥ जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥ सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥ अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥ व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥ तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥

साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥ छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥

चौपाई

तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥ बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥ विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥ विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥ विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥ मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥ करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥ गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥