भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(१०७)

गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥ याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥ सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥ नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥ नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥ नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥

छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥

चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥

खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥

कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥

सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥

बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥

चौपाई

ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥ इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥ तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥ उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥ कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥ यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥ बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥ साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥

१ महल