कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
(१०७)
गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥ याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥ सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥ नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥ नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥ नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥
छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥
चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥
खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥
कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥
सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥
बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥
चौपाई
ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥ इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥ तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥ उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥ कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥ यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥ बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥ साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥
१ महल
(१०८)
बीरसिंह बोध
दीवान वचन
राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥ कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥ का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥
राजा बीरसिंह वचन
करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥ जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥
कबीर वचन
तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥ सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥ राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥ चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥ दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥ राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥ सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥ अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥ भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥ ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥
राजा बीरसिंह वचन
छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥ हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥ बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥ पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥ सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥ अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥
बोधसागर
(१०९)
साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥ गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥
चौपाई
करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥ कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥ मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥ राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥ जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥ खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥ लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥ फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥ परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥ ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥
साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥ मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥
कबीर वचन-चौपाई
तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥ होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥ अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥ वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥ सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥ हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥
राजा बीरसिंह
राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥ अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥
राजाका कबीर साहबका शिष्य होना
(११०)
बोरसिंह बोध
अब मन जनि दाय करि जानो । हम सेवक तुम निज कै मानो ॥ राय प्रतीति बहुत मन भाई । देखि प्रीति चलन फरमाई ॥ कुंजर राय भये असवारा । ले हमहीं पुनि तहाँ बैठारा ॥ सब सेनाकी भयी तैयारी । बजा निशान लगी नहिं बारी ॥ ततक्षण राय वचन कहि दीना । भरि भरि वर्तन सबही लीना ॥ छोड़ि सरोवर चले रिंगायी । क्षणहि सरोवर छार उडायी ॥ जब राजा पुनि पाछे निहारा । नहीं सरोवर उड़ैं तहाँ छारा ॥ देखत राजा चकित न थोरा । मँम पद गहि चित्त बहु मोरा ॥
साखी-धन्य कवीर सरोवर रची, दलहिं लीन ज़िवाय ॥
जहवाँको जल लायक, तहाँको दीन पठाय ॥
चौपाई
आगे मोहि करि जबही लीन्हा । तब पीछे राजा पग दीन्हा ॥ चले राय महल पग दियऊ । सतगुरुको आगे करि लयऊ ॥ मन्दिर कञ्चन पलंग बिछावा । लै सतगुरुहि तहाँ बैठवा ॥ मानिक देह रानी चली आयी । कहै राय रानी गहु पायी ॥
राजा बोरसिंह वचन रानी प्रति
चरण टेकि चरणामृत लीजै । गुरुकी दया अमृत रस पीजै ॥ लोक लाज तुम तजहु बडाई । गुरु कवीरकी शरणे आई ॥ गुरु कृपा होय दास पर जबहीं । काल त्रास ना ब्यापे तबहीं ॥ ज्ञान भक्ति विन गुरु न पावै । काल फन्द स्वपने नहिं जावै ॥ सर्गुण भक्ति जगत बतलावे । निर्गुण भक्ति गुरुसे पावे ॥ विन निर्गुण नहिं जीव छुटावे । बार बार यम फन्द परावे ॥ छन्द-गुरु कृपा होय जेहि दासपै तेहि काल त्रास न ब्यापई ॥ गुरु भक्ति मुक्ति दाता भक्त त्राता छुटै जीव तहाँ तापई ॥
१ मेरे पग पर पड़कर मनके अभिमानको छोड़ दिया ॥
बोधसागर
(१११)
संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥ गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥
चौपाई
सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥ बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥ नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥ कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥ नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥ रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥
राजा बीरसिंह वचन
चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥ आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥ मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥
कबीर वचन
सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥ श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥ तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥
दूत वचन
साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥
कबीर वचन
तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥ इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥ चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥ पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥
(११२)
बीरसिंह बोध
युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥ चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥ राजा परे चरणतर आयी ।
राजा बीरसिंह वचन
। दयावंत भल कोक दिखायी ॥
कबीर वचन
देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥ पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥
कबीर वचन
तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥ राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥ बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥ छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥ दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥
राजा बीरसिंह वचन
अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥ अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥ राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥ जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥
कबीर वचन
तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥ चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥ नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥
राजा वीरसिंहका गुरुस्तुति करना
बोधसागर
(११३)
कलश ले अरु पांचो बाती । साधु संत बैठे बहु भांती ॥ कंचन झारी जल धरवाई । तापर खरचा सात चढाई ॥ स्वेत चँदेवा स्वेत कनाता । सत्यपुर कह सूकृत वाता ॥ सत्यलोक स्वेत है फूला । स्वेत सब देह जीवका मूला ॥ स्वेत सिंहासन चौका चारी । सतगुरु बैठे आसन मारी ॥ कदली पत्र मेवा संयूता । चन्दन श्वेत सुगन्ध बहूता ॥ राजा सकल साज लइ आये । साधु संत बैठे सब आये ॥ विधिपूर्वक शुभ चौक पुराया । हाथ जोरि ठाढा भयो राया ॥ बोले साधु शब्द धुनि तबहीं । रानी राय चरण गहे जबहीं ॥
राजा बीरसिंहका सतगुरुकी स्तुति करना
राजा लीन्ह नारियर हाथा । बहुत जीव तहाँ भये सनाथा ॥ करी दंडवत विन्ती कीना । हंस राज मोहि दर्शन दीना ॥ धन्य भाग मम काह सराहू । हे प्रभु तुम हौ सत्य मम नाहू ॥ छन्द-आनन्द कन्द सर्वज्ञ रूप अखिल ज्ञाता अविगतं ॥ दास जानि दीजै अभय पद ज्ञानदाता अस्थितं ॥ अविनाश सागर-दयाके आगर धर्म कंटक मर्दनं ॥ संशय खण्डन रिपुविहंडन अजर वीरा सुमिरावैनं ॥ सोरठा-अमर पुरी तुव बास, अमर स्वरूपी हंस जहँ ॥ वास दीजिये दास, सुरतिवंत प्रभु कीजिये ॥
कबीर वचन-चौपाई
करि चौका तब नरियर मोरा । करि आरती भयो पुनि भोरा ॥ तिनका तोरि पान लिखि दयऊ । रानी राय अपन करि लयऊ ॥ बहुतक जीव पान मम पाये । ताघट पुरुष नाम सात आये ॥ जो कोइ हमारा बीरा पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥ बीरा पावे भवते छूटे । विनु बीरा यम धरि २ लूटे ॥
कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त राजासे कहना
(११४)
बीरसिंह बोध
सत्य कहूँ सुनु धर्मदासा । विनु बीरा पावै यम फांसा ॥ बीरा पाय राय भय भागा । सत्य ज्ञान हृदयमें जागा ॥ काल जाल तब सबै पराना । जब राजा पायो परवाना ॥ गद्गद् कंठ हरष मन बाढा । विनती करै राजा होय ठाढा ॥ प्रेमाश्रु दोइ नयन ढरावै । प्रेम अधिकता वचन न आवै ॥
राजा बीरसिंहका स्तुति करना
करुणारमन सद्वरु अभय मुक्तिधामी नाम हो ॥ पुलकि सादर प्रेम वश होय सुधरे सो जीवन काम हो ॥ भवसिन्धु अति विकराल दारुण तासु तत्त्व बुझायऊ ॥ अजर बीरा नाम दै मोहि पुरुष दरश करायऊ ॥ सोरठा-राय चरण गहे धाय, चलिये वहि लोकको ॥ जहवाँ हंस रहाय, जरा मरण जेहि घर नहीं ॥
कबीर वचन
आदि अन्त जब नहीं निवासा । तब नहिँ दूसर हते अवासा ॥ तौन नाम राजा कहँ दीना । सकल जीव आपन करि लीना ॥ रायं श्रवण जब नाम सुनायी । तब प्रतीति राया जिव आयी ॥ सत्यपुरुष सत्य है फूला । सत्य शब्द है जीवको मूला ॥ सत्य द्वीप सत्य है लोका । नहीं शोक जहाँ सदा अशोका ॥ सत्यनाम जीव जो पावै । सोई जीव तेहि लोक समावै ॥ ऐसो नाम सुहेला भाई । सुनतहिँ काल जाल नशि जाई ॥ सोई नाम राजा जो पाये । सत्य पुरुष दरशन चित लाये ॥ साखी-ऐसो नाम है खसमका, राय सुरति करि लीन ॥ दर्षित पहुँचे पुरुष घर, यमहिँ चुनौती दीन ॥
चौपाई
जब हंसा यम छेके आयी । चलत बेर निज मना सुनायी ॥ मंडल अखण्ड ब्रह्मण्डे बासा । नीर पवन हंस रहिवासा ॥
बोधसागर
(११५)
सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥ फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥ हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥ तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥
साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥ दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥
चौपाई
धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥ तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥ युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥ प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥ तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥ पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥ जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥ नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥
साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥ तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥
राजा बीरसिंह बचन-चौपाई
साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥ औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥ दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥ महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥ ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥ भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥
राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन
(११६)
अमरसिंह बोध
कबीर वचन
अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥ गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥ बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥ सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥ ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥
कबीर वचन
तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥ पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥ राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥ माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥ भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥
राजा बीरसिंह वचन
राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥ सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥ एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥
बोधसागर
(११७)
ब्राह्मणी वचन
छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥ गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥ हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥ करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥
कबीर वचन
सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥ कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन-बीपाई
साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥ कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥ कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥
कबीर वचन
एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥ छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥ यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥ राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥ नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥ लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥
ब्राह्मणी वचन
अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥
जगन्नाथ वचन
जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥ अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥
१ जगन्नाथपुरीको ।
(११८)
बीरसिंह बोध
ब्राह्मणी वचन
तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥ राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥ उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥ तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥
जगन्नाथ वचन
जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥ उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥
कबीर वचन
जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥ छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥ ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥
ब्राह्मणी वचन
हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥
छडीदार वचन
छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥ जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥ जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥ जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥ जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥
कबीर वचन
छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥ अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥ जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥
बोधसागर
(११९)
कबीर वचन
जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥ वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥ मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥ सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥ चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥ ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥ पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥ अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥ तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥ छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥ अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥ धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥ धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥
राजावीरसिंह वचन
सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥ धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥
कबीर वचन-चौपाई
यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥ दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥ निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥ रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥ शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥ यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥
राजा वीरसिंह वचन
राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥
कबीर साहबका मगहरमें बिजुलीखाँके घर शरीर छोड़ना और राजा वीरसिंहका फौज लेकर बिजुलीखाँसे युद्धको जाना
(१२०)
बीरसिंह बोध
पुत्र व्याह कहैं आयसु पाऊँ । तौ साहब हम व्याह कराऊँ ॥ महा कठिन दोनो दिशि धारा । पुत्र काज हम तहाँ विचारा ॥
कबीर वचन
आज्ञा लेइ राय दल साजा । साजि कटक बहु ठाढ भे राजा ॥ तब मम चरण शीस नृप लाये । करन विनय टेके गहि पाये ॥
राजा बीरसिंह वचन
विन्ती कीन भरि करुणा । नहि जानू होय धोखे मरणा ॥ साहब रहिहो सदा सहाई । देह विदेह हंस मुकताई ॥
कबीर वचन
तब हम हाथ सीस तेहि दीना । करुणा कहा राय तुम कीना ॥ तुम तौ राय हंस मम आहू । दीन आशीष निडर होय जाहू ॥ चरण टेकि नृप भये असवारा । चले कटक जब पेलिनकारा ॥ बाजत बंब चले नृप जबहीं । भांति भांति बाजा बाजे तबहीं ॥ साजि बरात राजा चलि गयऊ । लीला एक रचत हम भयऊ ॥ तब हम तन तजि भये न्यारी । रानी चिता रचन मन धारी ॥ रानी बहुत शोच मन कीन्हा । राजा गये गुरु अस लीन्हा ॥ विजलीखाँ सुनि आतुर धाये । चिता माँझते सुरदा लाये ॥ गोर बनाय उन कीन निवाजा । कीन कटोरी बहुविधि साजा ॥
विजलीखाँ वचन
कहत पठान पीर भल लाये । ना तो रानी देत जराये ॥
कबीर वचन
यहवाँ रानी हिय अकुलाती । बीरसिंह देवको भेजी पाती ॥ छन्द-भेजी रानी रायको पाती सदगुरु गये लोक सो ॥ नृप जात गुरु तन तजे मोहि देख भो बड शोक सो ॥ चिता रची मुर्दा धरी तब आय विजलीखान हो ॥ जोर करि करि हमसो ले गये ले गाडि गोरहि दीन हो ॥
बोधसागर
(१२१)
सोरठा-वेगि नृपति चलि आव, सतगुरु काया लीजिये ॥ हँसे लोक बड चाव, नृप गुरु कहिकै म्लेच्छ सब ॥
कबीर बचन
पाती गही देखु जब राया । महाकोध आतुर चलि आया ॥ डारत घृतहि ढुताशन जैसे । रोम रोम पावक वरु तैसे ॥ चले सकल दल छोडि वराता । ब्याकुल राय कहे तब वाता ॥
राजा बीरसिंह बचन
अरे दिवान सुनो मतिवाना । वेगि चलौ गुरु कैसे ठाना ॥ विजुली मारहु शत्रु हमारा । करी विचार बैठ हंकारा ॥
कबीर बचन
आतुर चले बाजि गज धाये । कूड़ुक बाण गहि लीन चढाये ॥ खड्गतुपक औ सेल कटारा । धनुष बान करि वेगि सवारी ॥ कुड़ुक बाण हाथ करि लीना । अगनित बाजा बाजत दीना ॥ ठाढा भांट अनेक पुकारे । गुण वरने चारन बहु पारे ॥ भेजे राय पाँति तेहि बारा । खोदि कबर गुरु देहु हमारा ॥ नहि तो विजली बचे न पाई । एक एकको मारि गिराई ॥ आई पाँति तब कहे पठाना । सुनि विजली गहि लीन कमाना ॥
विजलीखाँ बचन
हिन्दू काफिर पीर न पावे । जान माल जो सब गलि जावे ॥
कबीर बचन
विजली खान सेना ले ठाढा । आपुन दीस बहुत बड गाढा ॥ पीर आपना हम नहि देते । विरसिंह राय करेगा केते ॥ तब हम रानी दर्शन दीना । मानिक दे चरणामृत लीना ॥ छोटी है कमलापति रानी । सो मम चरण पखारे आनी ॥ रानी राय कहा मोहि चीन्हा । मानुष विधि तुम हमकूँ कीना ॥ हाड मांस हमरे नहि काया । काहे दोनों रार बढाया ॥
पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके समयके मार्गका वर्णन
(१२२)
बीरसिंह बोध
राय पठान दोनों गुरु भाई । काहे दोनों करे लड़ाई ॥ पाती भेजहु राय पठाना । खोदि कबर देखो मतिवाना ॥ गोर मांहि सुरदा जो होई । राय पठान लड़ो तुम दोई ॥ जो मुर्दा तुम दूँठ न पाओ । काहेको तुम रार बढाओ ॥ मथुरा रतना कदोइन नारी । तिन बड प्रीति हमारी धारी ॥ सात दिवस लगि अन्न न पावा । हमरे दरस को सुरति लगावा ॥ ताको दर्शन दिये हम जाई । काहे मरो दोऊ गुरु भाई ॥ अन्तर्धान तब हम होइ गयऊ । तत्क्षण रतना दर्शन पयऊ ॥ यहाँ राना पाती पठवायी । राय देखि अचरज मन लायी ॥ गये बाँचि जहाँ रहै पठाना । सुनत पठान अचम्भो माना ॥ सुनत सलाह कीन पुनि दोई । राय पठान आये सब कोई ॥ आइ पठान गोर खुदवाई । देखो तहाँ देह नहीं पाई ॥ भये अधीन देख सब लोगा । करुणा करहि सकल भयो सोगा ॥ छन्द-भये सुकृत उदास सबहीं रंक निधि जैसे हरयो ॥ धन्य गुरु कहा बंदना तब चीन्ह गुरु मम ना परयो ॥ अमी पाय गुरु पंकज गहेसो काग होय मराल हो ॥ पाय अस्थिर सदन निर्बध हंस होय बड भाग हो ॥ अखंड धर्म विराज सतगुरु जहाँ काल नहीं पहुँच है ॥ असंख्य रवि अरु कोटि दामिनि अग्र शोभा तहाँ सहे ॥ दयासागर असहि विराजत पुष्प सज्या सोहहीं ॥ करहि कलोहल हंस सबहीं पुरुष दरश विलोकहीं ॥ सोरठा-षोडश रवि प्रभाव, चकोर उडगन पोहिया ॥ श्रवण आहि रवि भाव, अमृत फल हंसा चुगे ॥
चौपाई
गोर बनाय चले सब कोई । हिन्दू मुसलमान पुनि दोई ॥ नाना भाँति करत सब सोभा । कंठी तिलक देखि सब लोभा ॥
बोधसागर
(१२३)
धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥ ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥ सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥ शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥ पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥ चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥ नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥ तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥ घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥ तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥ राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥ एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥ राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥ बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥ तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥ भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥ चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥ चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥ यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥ हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥ दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥ जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥
साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥ ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥
(१२४)
बीरसिंह बोध
चौपाई
तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥ निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥ धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥ जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥ अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥ चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥ तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥ मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥
छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥
बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥
काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥
करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥
सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥
कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥
चौपाई
तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥
आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥
साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥
हरिहर वचन
हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥
दूत वचन
कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥
वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥
आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥
नाम माहात्म्य
बोधसागर
(१२५)
कबीर वचन
वहाँ दूत पहुँचे हरि पासा । यहाँ जीव कहत सुखवासा ॥
जीव वचन
विनय जीव सुनु बन्दी छोरा । हम कहैं कष्ट दीन बड चोरा ॥ नाम तुम्हार बूझे यमराया । कहा नाम तब बचने पाया ॥ तब हम ततछिन कीन पुकारा । बेगहि आओ खसम हमारा ॥
ज्ञानी वचन
सुनो जीव नहिं शब्दहिं ध्यावा । राजा गुरु मानुष विसरावा ॥ गहे नाम अरु करे कमाई । तब यम दूत निकट न आई ॥
जीव वचन
जेहि ते हंसको घर पठवायी । तौन नाम मोहि भाषि सुनायी ॥ जाते जीव अमर घर जावै । दूत भूत यम खबर न पावै ॥
कबीर वचन
साखी-गुप्त नाम सुख भाखिया, अकह अमर निज नाम ॥ अमर कृपा निधि जीव कूँ, पहुँचे जीव निज ठाम ॥
चौपाई
पहुँचे जीव खसम घर जबहीं । सुख आनन्द भये बड तबहीं ॥ कंचन कलस बरत तहैं बाती । आरति करे हंस बहु भांती ॥ देखत जीव हंस उजियारा । अंग अंग शोभा चमकारा ॥ देख द्वीप शोभा बहु भांती । रविशशि मनि लागे जिमि पांती ॥ ता मध्ये जिमि लाल जंडाई । बीच बीच चुनि लै बैठाई ॥ मोतीसर झालरि बहु पोहा । देखत हंस रहे तहैं मोहा ॥ तबहिं पुरुष ज्ञानी हँकराई । कौन वचन तुम जीव सुनाई ॥ कौन वचन तुम जीवन दीना । जाते जीव अटक यम कीना ॥
(१२६)
बीरसिंह बोध
ज्ञानी वचन
दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥ विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥
पुरुष वचन
आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥ कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥
हंस वचन
मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥ हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥ जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥ साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥ साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥ अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥
साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥ तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥
चौपाई
जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥ सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥ निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥ नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥ जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥ पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥
छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥ पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥