कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(१२१)
सोरठा-वेगि नृपति चलि आव, सतगुरु काया लीजिये ॥ हँसे लोक बड चाव, नृप गुरु कहिकै म्लेच्छ सब ॥
कबीर बचन
पाती गही देखु जब राया । महाकोध आतुर चलि आया ॥ डारत घृतहि ढुताशन जैसे । रोम रोम पावक वरु तैसे ॥ चले सकल दल छोडि वराता । ब्याकुल राय कहे तब वाता ॥
राजा बीरसिंह बचन
अरे दिवान सुनो मतिवाना । वेगि चलौ गुरु कैसे ठाना ॥ विजुली मारहु शत्रु हमारा । करी विचार बैठ हंकारा ॥
कबीर बचन
आतुर चले बाजि गज धाये । कूड़ुक बाण गहि लीन चढाये ॥ खड्गतुपक औ सेल कटारा । धनुष बान करि वेगि सवारी ॥ कुड़ुक बाण हाथ करि लीना । अगनित बाजा बाजत दीना ॥ ठाढा भांट अनेक पुकारे । गुण वरने चारन बहु पारे ॥ भेजे राय पाँति तेहि बारा । खोदि कबर गुरु देहु हमारा ॥ नहि तो विजली बचे न पाई । एक एकको मारि गिराई ॥ आई पाँति तब कहे पठाना । सुनि विजली गहि लीन कमाना ॥
विजलीखाँ बचन
हिन्दू काफिर पीर न पावे । जान माल जो सब गलि जावे ॥
कबीर बचन
विजली खान सेना ले ठाढा । आपुन दीस बहुत बड गाढा ॥ पीर आपना हम नहि देते । विरसिंह राय करेगा केते ॥ तब हम रानी दर्शन दीना । मानिक दे चरणामृत लीना ॥ छोटी है कमलापति रानी । सो मम चरण पखारे आनी ॥ रानी राय कहा मोहि चीन्हा । मानुष विधि तुम हमकूँ कीना ॥ हाड मांस हमरे नहि काया । काहे दोनों रार बढाया ॥