भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(१२०)

बीरसिंह बोध

पुत्र व्याह कहैं आयसु पाऊँ । तौ साहब हम व्याह कराऊँ ॥ महा कठिन दोनो दिशि धारा । पुत्र काज हम तहाँ विचारा ॥

कबीर वचन

आज्ञा लेइ राय दल साजा । साजि कटक बहु ठाढ भे राजा ॥ तब मम चरण शीस नृप लाये । करन विनय टेके गहि पाये ॥

राजा बीरसिंह वचन

विन्ती कीन भरि करुणा । नहि जानू होय धोखे मरणा ॥ साहब रहिहो सदा सहाई । देह विदेह हंस मुकताई ॥

कबीर वचन

तब हम हाथ सीस तेहि दीना । करुणा कहा राय तुम कीना ॥ तुम तौ राय हंस मम आहू । दीन आशीष निडर होय जाहू ॥ चरण टेकि नृप भये असवारा । चले कटक जब पेलिनकारा ॥ बाजत बंब चले नृप जबहीं । भांति भांति बाजा बाजे तबहीं ॥ साजि बरात राजा चलि गयऊ । लीला एक रचत हम भयऊ ॥ तब हम तन तजि भये न्यारी । रानी चिता रचन मन धारी ॥ रानी बहुत शोच मन कीन्हा । राजा गये गुरु अस लीन्हा ॥ विजलीखाँ सुनि आतुर धाये । चिता माँझते सुरदा लाये ॥ गोर बनाय उन कीन निवाजा । कीन कटोरी बहुविधि साजा ॥

विजलीखाँ वचन

कहत पठान पीर भल लाये । ना तो रानी देत जराये ॥

कबीर वचन

यहवाँ रानी हिय अकुलाती । बीरसिंह देवको भेजी पाती ॥ छन्द-भेजी रानी रायको पाती सदगुरु गये लोक सो ॥ नृप जात गुरु तन तजे मोहि देख भो बड शोक सो ॥ चिता रची मुर्दा धरी तब आय विजलीखान हो ॥ जोर करि करि हमसो ले गये ले गाडि गोरहि दीन हो ॥