कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ९ )
सोरठा-निज मन सुकुर सुधार, गुरु पदपंकज उर धारिए ॥ मिटै सकल अँधियार, अस्थिर घर तब पाइए ॥
चोपाई
राजा आज्ञा रानी मानी । साहब चरण पखारे आनी ॥ कश्चन झारी ले जल धायी । साहब चरण पखारी आयी ॥ राजा रानी चरण धुवाये । अँचरन रानी तबहि पुछाये ॥ चरण हिये मन्थे पर लायी । चरणाभूत सबही मिलि पायी ॥ कीन्ह दण्डवत पलपल रानी । साहब दरस दीन्ह भल आनी ॥
रानी वचन
साखी-हमहिं जनि भार चढ़ावहु, हमरे नाम कबीर । अगम निगम वह पुरुष है, जे गहि लागो तीर ॥
रानी वचन-चोपाई
सुनिके रानी वचन पतियानी । तब साहब सों बिननी ठानी ॥ और पुरुष जानो नहिं नीका । तुम सतपुरुष आहु यहि जीका ॥ तुमहि पुरुष आहु दृढ़ जानी । और पुरुष नाहीं मन मानी ॥ रानी कहै सुनो महाराजा । साहिब आये तुमरे काजा ॥ रानी कहै बेगि गहु चरना । काल अजापी है निज मरना ॥ आये पुरुष हमारे पास । हमरे मनकी पूजी आसा ॥
रानी वचन
सुनहु राय रानी निज वचना । यह तो जाल कालकी रचना ॥ मेटहु काम कोध हंकारा । माया मोह तजौ संसारा ॥ ज्ञान हेतु दृढ़ करनी करई । आवागमन का पूग परई ॥ तजि संसार शब्द कहँ ध्याओ । गुरुगम पुरुष नाम चितलाओ ॥
साखी-ना फिर जन्मे जोइनि ना, स्वर्ग नर्क को जाय ॥ सो हंसा रहित भये, अजर अमर घर पाय ॥