भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

ज्ञानसागर

( ४९ )

साखी-दोई सुत तब बरजी, आदि भवानी आय ॥ बर ऊषा अनिरुद्धको, शंकर दीन्ह मिलाय ॥

चोपाई

चले कृष्ण और सुत भामिनि । तासु अंग चमके जिमि दामिनि ॥ कृष्ण द्वारिका पहुँचे जाई । सो वृत्तान्त कहौं समुझाई ॥ जोपै हर हरिको व्रत धरई । प्रभु सेवक कहु काहे लरई ॥ प्रभु सेवक कहु कैसे लड़ाई । सो गति मोहि कहौ समुझाई ॥ हरि हर युद्ध सबै कोइ जाना । सहस्रनाम किमि करब बखाना ॥ यमराजा जु ठगौरी लायी । ज्ञान देख कर चेतो भायी ॥ बूझौ सब मिलि पाखंड धरमा । मैं जानौं भल कालही मरमा ॥ अदेख देख सब कहि समुझाई । ताको विरला जन पति आई ॥

साखी-शङ्कर कियो युद्ध हरिसों, तब कहु कैसो दास ॥ पंडित जन सब थापहीं, सहस्र नाम विश्वास ॥

चोपाई

चारौं वेद को मूल बताऊँ । सहस्र नाम को सार बुझाऊँ ॥ काशीमें विश्वास जनावई । विश्वनाथके मंदिर धावई ॥ विश्वनाथको भेद बतावहु । सार ग्रन्थ मोही समझावहु ॥ सबै ग्रन्थ करि आगिल कीन्हा । भक्ति तत्त्व सबै मिलि चीन्हा ॥ सब पर सहस्र नाम परवाना । जहाँ लग शास्त्र रु वेद पुराना ॥ तेहि जाने जेते सब कोई । बूझौ मरम जु विरला कोई ॥ बूझौ पंडित भेद बताई । प्रभु सेवक कहु कैसे लराई ॥ यह सब बन्ध बहुत मैं भाखी । ते यमराजा सब ठग राखी ॥ ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥ तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥

साखी-भूल परी सब दुनियाँ, पाखंडके व्यवहार ॥ मूल छाँड़ि डारे गहै, कैसे उतरे पार ॥