भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ५० )

ज्ञानसागर

चौपाई

तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिलव्यवहारा ॥ पांडव पांच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥ मारन तासु को मतौ बिचारा । पांडव कौरव नृप दोह मारा ॥ दोनोंमें छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहि जाना ॥ बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहँ आई ॥ राजा दुपद स्वयम्बर ठाना । तहँ पारथ राहु संधाना ॥ दुयोंधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥ कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पांच पति भावा ॥ तेहि मारन हरि मतौ बिचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥ कौरव आई जो करहि लड़ाई । ताहि कृष्ण छलसे भरवाई ॥ मारचो करण गंगसुत द्रोना । सबको मारि कियो दल सूना ॥ मारचो दुयोंधन जो राई । अठारह शोहणी मार गिराई ॥

साखी-पाँचों पांडव बचि रहे, औ जूझे सब झार ॥

धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥

चौपाई

चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना । शून्यआदि जहँ शशिनहिंभाना ॥ पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ । तहाँ जाइके स्तुति कियेऊ ॥ अलख निरंजन अंतर््यामी । सब ते न्यारे हो तुम स्वामी ॥ सबमें व्याप्त निरंजन राया । पाँचो तत्त्व शून्य उपजाया ॥ तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि अंत तुम देव गणेशा ॥ अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी । करहु दया तुम अंतर्यामी ॥ ततक्षण भई अकाशतें वाणी । अहो कृष्ण सबको उत्तपानी ॥ अब जो कहैं करो सो जानी । सोई वचन लेव सिर मानी ॥ तुम भेजा महि भार उतारहु । असुरनको विध्वंसके मारहु ॥