भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २४ )

जगजीवनबोध

रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥ दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥ परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥ दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥ स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥ तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥ सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥ और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥ ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥ तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥ यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥ जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥ एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥ कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥ यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥ देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥ अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥ पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥ अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥ मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥ बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥ ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥

साहिब वचन

तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥ अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥