भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 605, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 605

बोधसागर

( २५ )

कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥ गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥ बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥ बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥ गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥

जगजीवन वचन

बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥ दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥ दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥ मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥

सतगुरु वचन

गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥ बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥ जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥

जगजीवन वचन

अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥ मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥

सतगुरु वचन

कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥ नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥ सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥ बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥ सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥ नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥ घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥ पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥