कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 663, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ८३ )
साखी-कहो ब्रह्मका भूलहू, कहौं तोहि समुझाय । मोर मोर कै धावहू, ममता अमल चलाय ॥
चोपाई
ममिता ते दशों अवतारा । ममिता महादेव धरु छारा ॥ ममिता लोमश योग जो कीन्ह। आयु बढी भगती नहिं चीन्ह।। ममिता ते आपुहिं जो रहेऊ । ममिता ते तीन लोक बहि गयऊ।। ममिता तेज निरञ्जन कियऊ । ममिता ते पुरुष दरश नपयऊ।। तुम ब्रह्मा कीन्हे अभिमाना । तेहिंते साहब अछय छिपाना ॥ साखी-ब्रह्मा गर्व तुम कीनिया, सुनि राखू यक बात । जो साहब अभि अंतरे, सोई सदा सँघात ॥ तुम अज्ञानी नहिं जानहू, सुनु ब्रह्मा यक बात । अविगति अगम अपार है, समरथ सदा सँघात ॥
विष्णु वचन-चोपाई
विष्णु कहैं सुनो हो भाई । चलहू तुरत ज्योति पहुँ जाई।। ज्योति कहैं सो सुनिये भाई । सब मिल चलहु साँचके आई।। आंखिन देखी पूछि न जाई । पाय अभिमान चीन्हे नहिं पाई।। अभिमान मता सब दूर दीजे । साँच बस्तुको धारण कीजे ॥ अभिमान समेत चीन्हे नहिं कोई । देह धरी सब गये विगोई ॥ आपा थापि सुधि बुधि खोई । आपा छोडे पावे सोई ॥
महादेव वचन
तब महादेव कहैं विचारी । अहो विष्णु पूछहु महतारी ॥ जो वह कहैं सो हम तुम मानैं । औरी बात नाहिं हम जानैं ॥ ब्रह्मा विष्णु से हुई यह बात । तुम बडे हो कि बडी है माता ॥ सबै मिली तब कीन्ह पयाना । जाइ माता ढिग कीन्ह बयाना ॥ बोलहु माता सत के भाऊ । नहिं अरुझावहु भाषि सुनाऊ ॥