भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८४ )

गरुडबोध

तीनों देव कहैं सुनु माता । और कौन पुरुष आहि विधाता ॥ हम तीनों कि और है कोई । यह निज भेद बतावहु सोई ॥

माता वचन

तब माता बोले हितकारी । कस न ब्रह्मा करहु विचारी ॥ जब तुम हते हमारे पास । तब तुम कौन पिता की आसा ॥ तबकी बात विसरी तुम गयऊ । पुरुष ते विमुख तुम भयऊ ॥ पुनि माता यक वचन अनुसारी । महादेव ही कृतम भिकारी ॥ अमर वचन जो हमहीं भाखा । युग चारों देह अमर राखा ॥ सोई वचन भूलि जो गयऊ । मातु पिता सो अंतर लयऊ ॥ पुनि माता गरुडसे बोली । अमृत वचन रसाल अति खोली ॥ कहे माता सुनु गरुड सुजाना । तुमतो वचन कही परमाना ॥

गरुड वचन

गरुड तब पूछे ज्योतिसों बानी । कैसे तुम यह सिरजा खानी ॥

माया वचन

तब उन कहा पुरुष सों बानी । पावक नीर पवन वैसानी ॥ जल रंग अंश सो साथहि रहई । ताकी खबरि कोई नहि लहई ॥ प्रथम अंशजल रंग जो कीन्हा । तब जलसिन्धुनाम कहि दीन्हा ॥ सारखी-ब्रह्मा विष्णु कोई नहीं, महादेव भी नाहिं । पुरुष एक तब अविगति, अगम अगोचर माहिं ॥

ब्रह्मा वचन चौपाई

कहे ब्रह्मा हम आपु प्रकाशा । हम पुहमी नौ खण्ड निवासा ॥ हम हैं नीर हमहिं हैं पवना । हमहीं रचा सकल सब भवना ॥ हमहीं पांच तत्त्व सब कीन्हा । हमहीं आप सृष्टि रचि लीन्हा ॥ हमहीं सकल सृष्टि विस्तारा । हम कर्ता है सकल पसारा ॥ हमहीं चन्द्र सूर दिन राती । हमहीं कीन्ह किरतम उत्पाती ॥ हमहीं आदि अंत मधि तारा । हमहीं अंध कूप उजियारा ॥