भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ८७ )

वही सकल भुवनका स्वामी । वही परम ब्रह्म अन्तर्यामी ॥ उन्ही नारी पुरुष बनावा । सकल सृष्टि उन्ही सिरजावा ॥ लाख चौरासी उनहि सँवारा । उन्ही गोरख नाम धरावा ॥ उन्ही छलिबलि पतालपठावा । काल रूप धरि जगमें आवा ॥ उन्ही यह सब खेले खिलायी । उन्ही सकल सृष्टि उपजायी ॥

साखी-कहे विष्णु गुरुड सुनु, कहे सुने का होय ।

एक निरञ्जन आपु है, दूजा और न कोय ॥

सात द्रौप नौखंडमें, एक निरञ्जन होय ।

और कौन सो देखिये, ताको कहिये सोय ॥

गुरुड वचन-चौपाई

मैल मलीन सकल संसारा । सो निर्मल जाके अन्त न पारा ॥

मैले ब्रह्मा मैले इंद्र । रवि मैला मैले शशि चन्द्र ॥

मैले सनक सनन्दन देवा । मैले यह जग लहै न भेवा ॥

मैले शिव ब्रह्मादिक देखा । मैले लोक ब्रह्माण्ड विशेषा ॥

निशि वासर मैले दिन तीसा । मैले काल मैले अवनीसा ॥

मैले जोत मैले तन हेता । मैली काया मैल समेता ॥

मैले निरंजन नर नहि जाना । उन यह सृष्टि कीन्ह पिसमाना ॥

निर्मल नाम एक है श्वेता । निर्मल सो जो नामहि लेता ॥

कहै गुरुड ते जन परमाना । जो निर्मल निज नामहि जाना ॥

साखी-निरंकार ओंकार है, पार ब्रह्म है सोय ।

एकनाम चीन्हे विना भटकि सुवा सब कोय ॥

साहब इनहि बनाइके, आपुइ रहै निनार ।

सो निज नाम जाने विना, कैसे उतरे पार ॥

चौपाई

कहत सुनत सबही सुधि पायी । कहत सुनत सब तीर्थहि जाई ॥

कहत सुनत ज्ञान बहु करई । दम्भ अभिमान बहुत सो धरई ॥