भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८८ )

गरुडबोध

कहत सुनत नर तीर्थहिं जायी । भरमतभरमतगलफांसलगायी॥ कहत सुनत सब सुनै पुराना । कहत सुनत सब देत है दाना ॥ कहत सुनत सब खेती करई । कहत सुनत नर माया धरई ॥ कहत सुनत जो जुगली करई । होय चंडाल नरक महाँ परई ॥ कहत सुनत नर रूप खुदावे । कहत सुनत उद्यम मन लावे ॥ कहत सुनत स्वाद मन धरई । कहत सुनत नर गढहे परई ॥ कहत सुनत नर माया जोरी । सौ सहस्र औ लक्ष करोरी ॥ कहत सुनत गुरु शिष्यजोकरई । आप अजान भरम में परई ॥ कहत सुनत भक्ति जो ठानी । कहत सुनत पायन पर आनी॥ कहत सुनत सागर तलाब बनावै । कहत सुनत पाप पुण्य कमावै॥

साखी-कहन सुनत सब गये हैं, कहत सुनत सब जाय ।

कहत सुनत करनी करे, तब प्रभु परसे आय ॥

महादेव वचन-चौपाई

क्रोधवंत महादेव तब भयऊ । हमहू को उठाय तुम धरऊ ॥ महादेव बोले बात विचारी । हमको जान्यो किरतम भिकारी॥ हमको मनुष्य देह करि जाना । भूली बात करे बखाना ॥ महादेव अस युक्ति बतायी । कहो तो सकलो देऊँ दिखायी ॥ कहो अकाशको बन्द बताऊँ । सात द्वीप नौ खंड दिखाऊँ ॥ अचरज एक बात उन भाखी । कहो तो आनि दिखाओं साखी॥ कहो तो गरुडही मारि कै डारों । कहो तो योग जीतहिं मारों ॥ कहो तो काल रूप हम धोरें । कहो तो पलमहँ मारि सँघोरें॥ कहो तो याही देउं भुलायी । बढ़ुरि न हमसों हो बौरायी ॥ यह सो बकवाद विचारा । हमसों बाजी करै अपारा ॥ यह तो आदि अंतसे आये । तेहिते ब्रह्म विष्णु कहाये ॥ हमहीं सिरजें पाले मारें । दानव देवी मारि उखारें ॥