भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(८२)

ब्रह्मा तो है जेठा भाई । वेद वाक्य सब कहै बनाई ॥ कैसे ब्रह्मा शीव उठावे । कैसे विष्णुहि हीन दिखावे ॥ सारखी-अगम निगम सब जानई, कहै मुक्तिका नीव । विष्णु काया दिढावई, योग दिढावे शीव ॥

गुरु बचन

सुनो महादेव मतिके हीना । तुम नहिं जानो पुरुष प्रवीना ॥ तुम तो आपहिं गर्वें झुलाये । तुम सेवक साहब होय आये ॥ तुम किंचित हो जीव विचारे । तुम्हरे कहे होय का पारे ॥ तुम्हरा किया कछू ना होई । आप पुरुष उपजावे सोई ॥ आप सुरत प्रभु कीन उचारा । तब तहैं चौदह भुवन सँवारा ॥ सेवा बदले पाय तिहुँल्लोका । जीवन कारन लाये धोका ॥ धोका लाय ठरयो संसारा । तीन लोकमें फन्द वसारा ॥ सारखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुनहु सत्य विचार । वह तौ पुरुष अखण्ड है, अपरमपार अधार ॥ तुम तीनों मिलि आपा थापी । आप थापी भये महा पापी ॥

सत्गुरु बचन

सुनु धर्मनि औरो यक बाता । उहैं तो सबै ज्ञानमहैं राता ॥ जब देख्यो सब आपा थापै । करत बडाई नहिं तनिको धापै ॥ तब अस युक्ति किया बनाई । जाते होय परीक्षा भाई ॥ बंग देश बालक यक रहेछ । जाति ब्राह्मण सबै तेहि पयछ ॥ ताकर आयू सबै खुटानी । मृत्यु निकट भयी तुलानी ॥ ताको ज्ञान अस हम दीना । मृत्यु निकट भयी आयु छीना ॥ काल वचन उपाय विचारो । ब्रह्मादिकके निकट पग धारो ॥ लाय गुरुड तुरत पहुँचाये । ब्रह्मा विष्णु शिवहि बताये ॥