भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बाधसागर

( २१ )

परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहँवा विराजै । नूरका महल और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द्व भाजै । करत कल्लोल बहु भाँतिसे संग यक हंस सोहंगके समाजै ॥ ४ ॥ हंस जब जात षट् चक्रको वेधिके सातमुखकाममें नजर फेरा । सोहंगके परे सुरति इच्छा कहीं सहसवामन जहँ हंस हेरा । रूपकी राशिते रूप उनको बना नहीं उपमा इन्दु जौनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै शब्दको टेकि चढ़ि देखि मुखकाम अंकूर केरा ॥ ५ ॥ शून्यके बीचमें विमल वैकुण्ठ जहाँ सहज अस्थान है गैव केरा । नवो मुखकाम यह हंस जब पहुँचिया पलक विलंब ह्राँ कियो डेरा । तहाँसे डोरि मकरतार ज्यों लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दै दरेरा ॥ भये आनन्दसे फंद सब छोडिया पहुँचिया जहाँ सत्य- लोक मेरा ॥ ६ ॥ हंसिनी हंस सब गाय बजायकै साजिकै कलश वहि लेन आये । युगन युग बीछुरे मिले तुम आहकै प्रेम करि अङ्गसो अँग लाये । पुरुषने दर्श जब दीन्हिया हंसको तपनी बहु जनमकी तब नशाये । पलटिकै रूप जब एकसे कीन्हिया मनहुँ तब भानु षोडश उगाये ॥ ७ ॥ पुहुपके द्वीप पीयूष भोजन करै शब्दकी देह जब हंस पायी पुहुपके सेहरा हंस औ हंसिनी सच्चिदानन्द शिर छत्रछायी । दिपैं बहु दामिनी दमक बहु भाँति की जहाँ घन शब्दको घमंड लायी । लगे जहाँ वरषने गरज घन घोरिकै उठत तहँ शब्द धुनि अति सोहायी ॥ ८ ॥ सुन सोह हंस तहँ यूथके यूथ है एकही नूर यक रङ्ग रागै । करत विहार मन भामिनी मुक्तिमें कर्म औ भर्म सब दूरि भागै । रङ्ग और भूप कोइ परखि आवै नहीं करत कल्लोल बहु भाँति पागे । काम औ क्रोध मद लोभ अभिमान सब छोड़ि पाखण्ड सत शब्द लागे ॥ ९ ॥ पुरुषके वदनकी कौन महिमा कहौँ

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