कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२ )
मुहम्मदबोध
जगत्में ऊपमाय कछु नाहिं पायी । चन्द्र औ सूर गण ज्योति लगै नहीं एकही नक्ख परकाश भाई । पान परवान जिन बंशका पाइया पहुँचिया पुरुषके लोक जायी । कहैं कब्बीर यहि भांति सो पाइहौ सत्य की राह सो प्रकट गायी ॥ १० ॥
देह नासूत स्वरे मलकूत और जीव जवरूतको रुह बखानै ॥ अरबी में लाहूत कहै जेहि निराकार मानिके मंजिल ठानै ॥ आगे हाहूत लाहूत है बाहूत खुद खाविन्द जाहूत जानै ॥ सोई श्री राम पन्नाइ सबै जग नाहि पन्नाह यह अता गानै ॥
इस प्रकारसे सत्यके खोजियोंको तो ऐसे ग्रन्थोंका आध्या- त्मिक अर्थही ग्रहण करने योग्य है । और स्थूल अर्थ तो स्थूल बुद्धिवाले पक्षपातियोंके लिये ही छोड देना उचित है ।
इति
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