भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ४८ )

सुलतानबोध

तबै शाह बहुत रिसियाना । खोजु शिकार हुकम फरमाना ॥ तबै शिकारी दुहुँ दिशि धावैं । पावैं न शिकार मनहि पछतावैं ॥ यहि विचलीला अस भइ भाई । सुनु धर्मनि तुम चित लगाई ॥ हरिन एक जो कनक रंग देखा । हीरा रतन मणि जडे विशेषा ॥ देखि सरूप शाह ललचाई । यहि मिरगा कहैं घेरो भाई ॥ आज्ञा पाइ चले असवारा । घरयो हिरण सेन मझारा ॥ कहे शाह जो मिरगा जाई । तुमसे मिरगा लेहौं भाई ॥ सेना सब से तब कहे पुकारी । मिरगा भागि शाह तर गयऊ ॥ शाह सब से तब कहे पुकारी । मिरगा मारि लाऊँ यहि बारी ॥ मिरगा संग सुलतान अकेला । नहिं कोइ सेना नहिं कोइ चेला ॥ छिन में मिरगा देखि लुपाना । तेहि पीछे धावहि सुलताना ॥ लागी प्यास शाह को भांरी । महा भयानक बनही मझारी ॥ वट का वृक्ष तहाँ यक देखा । शीतल छाया बहुत विशेषा ॥ मिला फकीर एक तहैं वासा । कुत्ता दोग्य रहै उन पास ॥ शीतल कलशा पानिहि भरिया । जापर ठिलिया मठका धरिया ॥ खोजत नीर शाह चलि आये । दुआ सलाम करि वचन सुनाये ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान प्यास सुहि भारी । जात जान तुम लेहु उबारी ॥

दुर्वेश वचन

हम फकीर दुर्वेश कहावैं । सुरति होय तो भरो पियावैं ॥ पियो शाह जल लियो निवासा । जिन्दे कीना अजब तमाशा ॥

१ दूर से आहू उते आया नजर । पहुँचा उसपर शाह घोडा मारकर ॥ होके वह अपने सवारों से जुड़ा । पीछे दो फरसंग तक उसके गया ॥ जाते जाते हो गया आहू खड़ा । वाफ़िहतत आबिन अब्रम से कहा ॥ तुम्हको इस खातिर नहीं पंदा किया । वहसियों पर ता करे जोरोजका ॥ है गरज ईजाद से तेरे कुछ और । कर जरा तू विलम अपने आप गौर ॥ बात यह कहकर वह गायब होगया । नक्शा उसका शाह के विलपर हुआ ॥