भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ५३ )

ऐसी करूणा भयि दिल माहीं । जिन्दा महल मिले केहिं ठाहीं॥ भयी शाह मन विरह अपारा । जिन्दा जिन्दा करइ पुकारा ॥ साखी-उन मनमें सुझको मिले, नाम न दिया बताय ॥ ईब्राहीम सुलतानको, भयो मिलनको भाय ॥

चौपाई

सुछित शाह मन चलि आवा । मनमें जिन्दा आनि बसावा ॥ थोडे दिन विरहा अधिकार्ई । फिरतो धरम जाल फैलाई ॥ माहिं पुनि राज तहैं सुख पाये । माया मोह देखि ललचाये ॥ गया ज्ञान सुखे में लपटाना । काल शाह घट आनि समाना ॥ उरझे शाह स्वाद सुख रंगा । देखि रंग मन बहुत उमंगा ॥ पुनि कछु दिवस जो ऐसे बीता । बिसरे शाह अछ्हाहकी चिन्ता ॥ ऐसी चाल देखि हम राही । राज न छोडे लोभ मनमाही ॥ तब हम रूप जो कीन खवासा । जेहि ते तरुत की छाडे आशा ॥ जैसा जिव तैसा तन धारा । कोइ विधि जिय उतारूँ पारा ॥ चतुर सहेली रूप अपारा । शोभा अंग अंग अधिकारा ॥ होय खवास बागमें जायी । फूल लाय रचि सेज विछायी ॥ बहु विधि फूलन सेज विछावें । जहां शाह पौढन निज जावें ॥ ऐसहि करत बहुत दिन गयऊ । तब हम एक अचम्भा कियऊ ॥ एक दिवस चित ऐसी आयी । ताहि सेज हम पौढे जायी ॥ रूप खवासिन तहैं हम कीन्हा । घडी एक पौढी सुख लीन्हा ॥ आये महल सेज ढिग शाहा । पौढि सहेली करे सुखलाहा ॥ इब्राहीम देखत रिसियाना । मनमाहीं बहुते खिसिआना ॥ हमरी सेज आई पौढाना । हमरी त्रास तनिक नहिं माना ॥ हांक मारि तिहि टेरि जगायी । देखत शाह मन क्रोध समाई ॥ शाह कहे क्यों पौढी नारी । बढचो क्रोध तब ताजन मारी ॥