कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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सुलतानबोध
❁ छन्द—हुकुम कीन शाह तन छीन लाव ताजन मारिये ॥ ताहि पीछे शीश उतारो पकडि भुजा फटकारिये ॥ मारन लागेउ शाह तेही खन हम कौतुक कीन्हे ॥ हँसी सहेली रोवे नहीं त्रास अतिशय तेहि दीन्हे ॥ सोरठा-बूझे तेहि सुलतान, मैं मारी तैं क्यों हँसी ॥ कहो साँची सहि दान, कहो सत ना कुम्हलाय मुख ॥
चौपाई
बहुत क्रोध करि मारा जबही । बहुते हँसी सहेली तबही ॥ हँसत सुलतान अचम्भा कीना । निकट बुलाय पूछि तब लीना ॥ निकट बुलाय आप सुलताना । वस्त्रशयो चूक करचो जिवदाना ॥
सुलतान वचन
यह तुम मोहि कहो समझायी । मारत तोहि हँसी क्यों आयी ॥ सच सच बात कहो निःशंका । तुमतो जनि मानो हमारी शंका ॥
सहेलीवचन—चौपाई
तबहि सहेली करे बखाना । सुनो शाह तुम चतुर सुजाना ॥ एक घड़ी सुख हम जो लीना । ता कारण इतना दुःख दीना ॥
- इस छन्द और उसके नीचेके सोरठाका पुरानी प्रतियोंमें गन्ध भी नहीं है । वरन् आगेसे जो चौपाई चली है उसका ऊपरकी चौपाईके साथ सम्बन्ध है । यह छन्द और सोरठा किसी महात्माने बैरागके जोशमें आकर लिखमारा है किन्तु कविताकी कंसी मिट्टी खराबकी है उसकी बात पाठक छन्द और सोरठासे समझ जायेंगे । देखिये सोरठाके प्रथम दोनों चरण तेरह २ मात्रासे पूर्ण हैं और तीसरे चरणमें भी १३ मात्रा हैं और चौथेमें पन्द्रह । कहीं तक कहें इसी प्रकारसे उत्तरोत्तर मट्टाचार्योंने ग्रन्थोंके विगाडनेमें ऐसा भाग लिया है कि ; जिससे कबीरपन्थकी साहित्य मूर्तप्राय होरही है । मुझे सब ग्रन्थोंके शोधनेमें कंसी २ कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं मैं हो जानता हूँ तिसपर भी मुझे कहीं तक सफलता हुई है पाठक स्वयम् समझ सकते हैं । वर्तमानमें यद्यपि कुछ कुछ विद्याकी ओर मुकाव कबीर पंथियोंकी हो रही है तथापि असीतक दो चारी को छोड़कर कोई भी ऐसा कबीरपन्थी नहीं है जो अपना कलंक और अपना विचार कबीर साहब कबीर पन्थी साहित्यके वे मत्थे न थोपता हो ।