कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 803, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(६३)
सुनो धर्मदास सुजान, शाह भये जीवन सुक्त ॥ पद पाये निर्वान, शब्द परखि करनी किये ॥
चौपाई
धरमदास चित अति हर्षाये । प्रभुलीला तुव वरणि न जाये ॥ शाह काज धारे प्रभु रूपा । सखी नाम धर कला अनूपा ॥ अमितकला जीवन सुख दाता । भव बूडत राखे शठ व्राता ॥ अधम उधारण नाम तुम्हारा । बहुत जीव कीने भव पारा ॥ महा नेह तुव चरण लगावा । यश रहो और परम पद पावा ॥ साखी-सत्य कबीर समरथ धनी, दोऊ दीन के ईश ॥
सुयश सुन्यो सुलतान को, धर्मनि नायो शीश ॥
नवीन प्रतियोंमें पुस्तक यहाँ आकर समाप्त होती है किन्तु पुरानी प्रतियोंमें ७३२-२८ पृष्ठके पंक्ति की आधी चौपाई “किया चहो तुम आपनो काजो” के आगे की बाणी उपर्युक्त नवीन प्रतिसे एकदम विरुद्ध नीचे लिखे अनुसार है ।
और नवीन प्रतिसे पुरानी प्रतिके अंतके एक समान न मिलनेका कारण उसे पृष्ठकी टिप्पणीमें दे दिया है । और विशेष वृत्तान्त पुस्तककी समाप्तिमें देंगे ।
चौपाई
किया चाहो तुम आपना काजू । तुम्हारौ राज छोड़िदो आजू ॥ सतगुरु नाम गहो विश्वासा । जाते मिटत कालको त्रासा ॥ यहि सुनि शाह तरुत तब छाडा । प्रकटे ज्ञान हिया गुण बाडा ॥ तब सतगुरुने अलख लखाया । करी प्रतीति परम पद पाया ॥ सांखी-सोलह सै सहेलियाँ, तुरी अठारह लख ।
साई केरे कारणे, छोडा शहरबलख ॥
इति
यह साखी एक स्थान में और दो भाग्यो है ।