भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 803

बोधसागर

(६३)

सुनो धर्मदास सुजान, शाह भये जीवन सुक्त ॥ पद पाये निर्वान, शब्द परखि करनी किये ॥

चौपाई

धरमदास चित अति हर्षाये । प्रभुलीला तुव वरणि न जाये ॥ शाह काज धारे प्रभु रूपा । सखी नाम धर कला अनूपा ॥ अमितकला जीवन सुख दाता । भव बूडत राखे शठ व्राता ॥ अधम उधारण नाम तुम्हारा । बहुत जीव कीने भव पारा ॥ महा नेह तुव चरण लगावा । यश रहो और परम पद पावा ॥ साखी-सत्य कबीर समरथ धनी, दोऊ दीन के ईश ॥

सुयश सुन्यो सुलतान को, धर्मनि नायो शीश ॥

नवीन प्रतियोंमें पुस्तक यहाँ आकर समाप्त होती है किन्तु पुरानी प्रतियोंमें ७३२-२८ पृष्ठके पंक्ति की आधी चौपाई “किया चहो तुम आपनो काजो” के आगे की बाणी उपर्युक्त नवीन प्रतिसे एकदम विरुद्ध नीचे लिखे अनुसार है ।

और नवीन प्रतिसे पुरानी प्रतिके अंतके एक समान न मिलनेका कारण उसे पृष्ठकी टिप्पणीमें दे दिया है । और विशेष वृत्तान्त पुस्तककी समाप्तिमें देंगे ।

चौपाई

किया चाहो तुम आपना काजू । तुम्हारौ राज छोड़िदो आजू ॥ सतगुरु नाम गहो विश्वासा । जाते मिटत कालको त्रासा ॥ यहि सुनि शाह तरुत तब छाडा । प्रकटे ज्ञान हिया गुण बाडा ॥ तब सतगुरुने अलख लखाया । करी प्रतीति परम पद पाया ॥ सांखी-सोलह सै सहेलियाँ, तुरी अठारह लख ।

साई केरे कारणे, छोडा शहरबलख ॥

इति

यह साखी एक स्थान में और दो भाग्यो है ।