भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मुलतानबोध

ग्रन्थ विवेचन

इस ग्रन्थकी कई प्रतियाँ मेरे पास उपस्थित हैं जिनमेंसे कोई पुरानी सौ वर्षसे अधिक की लिखी हुई भी हैं किन्तु पुरानी प्रति की अपेक्षा उत्तरोत्तर २ जैसे ३ नवीन पुस्तक लिखी गयी है सबमें कुछ वृद्धि और प्रसंगका उलट फेर और छन्दोभंग का समावेश होता गया है नवीन प्रतियोंके अन्तमें कई पुस्तकोंमें किसी किसी महात्माओंने अपना नाम लिखकर अपने को पुस्तकका कर्ता सिद्ध करना चाहा है । चाहा तो सब कुछ है किन्तु लिखते लिखते दोहा और सोरठा भी शुद्ध नहीं लिख सके हैं । सबसे जो पुरानी प्रति मेरे पास मौजूद है वह नवीन सब प्रतियोंसे अधिक शुद्ध और छोटी है और उसका आरम्भ भी “बलख शहर एक अनूपा” से होता है ठीक उसके उल्टा नवीन प्रतियोंका आरम्भ “धर्मदास उठि विन्ती लाई” से होता है । इसी प्रकारसे पुरानी प्रतियोंकी अपेक्षा नवीन प्रतियों के मध्य मध्यमें अधिक कथाएँ इतनी मिलाई गयी हैं कि, पुस्तक डेवटी हो गयी है । इतनीही नहीं है कि विषय बढ़ाया गया है किन्तु साथ ही साथ थोड़े २ वचन किसीमें एक दोहा किसीमें एक छन्द ( जो सब अशुद्ध हैं ) बढ़ाकर बढ़ाने वाले महाशय ग्रन्थके कर्ता बन गये हैं यद्यपि मैंने इस पुस्तक को सब प्रतियोंके अनुसार ठीक कर दिया है तथापि जहाँ २ विषयों को उलट फेर अथवा घटाव बढ़ाव हुआ है वहाँ टिप्पणी देदी है । इस ग्रन्थकी पुरानी प्रतिमें कबीर पंथकी अन्य ग्रंथों के समान किसी कर्ताका नाम तो है नहीं किन्तु नवीन प्रतियोंमें कई कर्ताओंका नाम, इससे किसी एक कर्ताका नाम निश्चय करनेमें अशक्ति होकर मैंने किसीका नाम