भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ६९ )

दुबारा नहीं आना । और यदि आओ तो तुम्हारी गर्दन मारी जाय । वजीरको अद्मशाहसे ऐसी प्रतिज्ञा लेनेका यह आशय था कि; अद्मशाहको जैसे फकीरको न मोती मिलेगा न वह फिर आयगा और न उसका विवाह शाहजादीसे होगा । यही कारण था कि, अद्मशाहको देखतेही वजीरने क्रोध करके कहा कि, ओ अद्म ! तू अपनी प्रतिज्ञाको भूल कर फिर यहाँ आया है ? इस कारण प्रतिज्ञाके अनुसार तेरा शिर घड़से अलग किया जायगा । वजीरके अहंकार भरे वचनको सुनकर अद्मशाहने कहा ओ बेखबर तुझे क्या खबर है कि, प्रभुने तेरे नमूनेके मोतीसे भी बढकर बहुमूल्य इतने मोती सुझको दिये हैं कि, जितना तेरे संकल्प में भी नहीं आ सकता है । प्रभुने तो बहुत दिये थे किन्तु मैंने चालीस चुनकर ले लिये हैं । अद्मशाहने इतना कहकर अपनी झोलीसे चालीसों मोती निकालकर बादशाहके मसनदपर गिनके पंक्ति लगाकर रख दिये । मोतियोंके निकलतेही चारों ओर उसका प्रकाश फैल गया । जौहरियों और परखियोंसे आश्चर्यमें आकर अबाक रहने के अतिरिक्त कुछ न बन पडा । बादशाहकी तो बुद्धिही ठिकाने न रही वह शोचने लगा कि, अब तो अवश्य शाहजादीका विवाह इसके साथ करदेना पड़ेगा । अन्तमें बादशाहने तो यह निश्चय किया कि, अब शाहजादी का विवाह उसी फकीरसे कर देना अच्छा है किन्तु राजद्वार का काम है । राजनीतिके नियमानुसार बादशाह एकान्तमें जाकर अपने वजीर और-परिवारोंसे इस विषयमें विचार करने लगा कि, शाहजादीको अद्मशाहसे विवाहना चाहिये कि नहीं, उस समय उसी वजीरने जिसने प्रथम बार प्रतिज्ञा कराकर अद्मशाहको मोती लानेके लिये भेजा था उस