भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सुलतान बोध

पीछा न फिरेगा। इतना कहकर उसने कहा यदि सत्य-पुरुषने आपको मेरा दुख दूर करनेको भेजा है तो आप सुझे उसीजोडके मोती दीजिये। जब सदगुरुने देखा कि, अह्म-शाह अपने निश्चयसे नहीं टलता है और उसको मोतीके सिवाय दूसरा कुछ नहीं सूझता है तब सदगुरुने कहा कि, हे अह्मशाह ! आँख बन्द कर। सदगुरु की आह्वाको पाकर अह्मशाह आँख बन्द करके अन्तरमें सदगुरुका ध्यान करने लगे। उधर तो वह ध्यानमें मस्त थे इधर सदगुरुकी आह्वा पाकर समुद्र लहर मारा और हजारों सीप रेतमें डाल गया। लहरके हट जानेपर जब अह्मशाहने आँख खोली तब क्या देखा कि, सहस्रों मोतीके सीपोंका ढेर लगा है मोतियों का ढेर तो पड़ा है किन्तु सदगुरुका पता नहीं है फिर तो अह्मशाहने मोती देखना आरम्भ किया। देखते २ वह ऐसे आश्चर्यमें फंसे कि, उन्हें यह निश्चय करना कठिन होगया कि, किसको लेवें और किसको न लेवें। अन्तमें चालीस बडे २ मोती चुनकर अपने कमरमें रक्षापूर्वक बांधकर रवाना हुए। चलते २ कुछ दिनोंमें जब बलखमें पहुँचे तब सीधे धडधडाते हुए बादशाहकी कचहरीमें पहुँचे। उस समय बादशाहकी कचहरी लगी हुई थी इनके पहुँच-तेही बादशाह और वजीर दोनोंकी दृष्टि उनपर पड़ी। देखतेही वजीर आग बगोला बन गया। वजीरके क्रोध करनेका कारण यह था कि, जिस समय अह्मशाह और वजीरसे इस बात की प्रतिज्ञा हुई थी कि मोती लेकर आनेपर शाहजादीसे उनका विवाह करा दिया जायगा उसी समय वजीरने अह्मशाहसे ऐसी प्रतिज्ञा ली थी कि, यदि मोती तुम न ला सको तो बलख शहरमें फिर