कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 807, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौबत्सागर
( ६७ )
हे भाई ! तू यह क्या कर रहा है ? समुद्रके पानीको उचलनेसे तुझे क्या लाभ है ? अद्भमशाह तो अपने काममें ऐसे मग्न थे कि, उन्हें कुछभी सुधि नहीं हुई कि, कौन मुझसे क्या पूछता है । जब सद्गुरुने कई बार पूछा और निकट जाकर उन्हें सचेत करके कहा कि, तुझे जो चाहिये मुझसे कह तेरेही लिये सत्यपुरुषने मुझे तेरे पास भेजा है । सद्गुरुकी इतनी बातको सुनकर अद्भमशाहको कुछ चेत हुआ और उन्होंने अपना सब वृत्तान्त आदिसे अन्त तक सुनाकर सद्गुरुसे कहा कि, यदि सत्यपुरुषने कृपा की है और आप मेरे दुःखको दूर करने के लिये आये हैं तब मुझको वैसाही मोती जैसा शाहजादीने मांगा है दीजिये । अद्भमशाहकी ऐसी इच्छाको सुनकर सद्गुरुने उन्हें समझाया कि, तू सच्चे साहिवका भजन कर जिसने तुझे और शाहजादी दोनोंको उत्पन्न किया है । सद्गुरुने बहुत कुछ ज्ञान और विवेक वैरागका अद्भमशाहको उपदेश किया किन्तु उन्होंने एक भी नहीं माना बरन उलटकर उन ने उत्तर दिया कि, मैं तो मोतीका मिलना और शाहजादीसे विवाह करनाही परम भजन समझता हूँ मुझे दूसरेसे कुछ सम्बन्ध नहीं है” ?
फिर सद्गुरुने कहा समुद्रका पानी तू क्यों उचलता है ? तब अद्भमशाहने उत्तर दिया कि, इसी प्रकार से उचलते उचलते समुद्रको सुखा दूँगा और समुद्रके सूखनेपर मोती लेकर जाऊंगा तब शाहजादीसे विवाह करूँगा । सद्गुरुने हंसकर कहा कि, भला यह कब सम्भव है कि, तेरे उचलनेसे समुद्र सूख जाय और तू मोती पावे अद्भमशाहने उत्तर दिया कि, समुद्र सूखे या न सूखे जबतक दममें दम है तबतक मैं अपने कामसे