कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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मुलतानबोध
लिये जाया करते । एक दिन संयोगसे बलखके बादशाहकी लड़की को देख लिया । अब तो ज्ञान ध्यान सब वैरागभूल गया । उस शाहजादी पर उनका मन ऐसा आसक्त हुआ कि, उसीके विरहमें दिन रात फिरने लगे । अन्तमें उसके मिलनेका कोई उपाय न देखकर स्वयम् उन्होंने बादशाहके पास जाकर अपने विवाहके लिये प्रार्थना की । उनकी प्रार्थना को सुनकर बादशाह तो सन्न हो गया । वह शोचने लगा कि, ऐसे फकीर भीख मांगतेको कन्या देकर उसे दुखसागरमें डुबाना है । बादशाहने ऐसा मनही मन विचार तो किया किन्तु आस्तिक होनेके कारणसे दुर्बैशकी बढ़-दुआ ( शाप ) से डरकर कुछ बोल नहीं सका और उसने दूसरे दिन फिर उन्हें आनेको कहा । उनके चले जानेपर बादशाह और वजीरने परस्पर विचार करके अह्मशाहको टाल देनेका उपाय निश्चय किया और जब नियत समय पर अह्मशाह बादशाहके पास पहुँचे तब वजीरने उनसे कहा कि, शाहजादीने अपने विवाहके लिये यह प्रतिज्ञा की है कि, नमूनेके अनुसार जो कोई दूसरा मोती ले आवेगा उसीके साथ वह ब्याह करेगी । अह्मशाहने वजीरको बहुत कुछ समझाया बुझाया गिडगिढाये रोये कल्पे किन्तु वजीरने एक भी न मानी । अन्तमें वजीरसे शपथ पूर्वक वचन लेकर वह मोतीकी खोज करनेको निकले और दो वर्षतक देश २ नगर २ ग्राम २ भटकते फिर अन्तमें यह सुनकर कि मोती खारे समुद्रमें उत्पन्न होता है खारे समुद्रके किनारे पहुँचे वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने खप्परसे पानी भरकर रेतमें फेंकना आरम्भ किया, इस प्रकारसे पानी फेंकते फेंकते जब उन्हें चालीस दिन बीतगये तब परम दयालु सत्यपुरुषकी आज्ञासे सद्गुरु उनके निकट समुद्रतटपर पहुँचे । वहाँ पहुँचकर सद्गुरुने अह्मशाहसे पूछा कि,