भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ७३ )

हृदयमें शूल उठा और उस दर्दने थोड़ीही देरमें ऐसा बल पकड़ा कि, हजारों वैद्य और उपाय करनेवालोंके रहते हुए भी शाहजादीको कुछ आराम नहीं हुआ । तीन चार घड़ीमें वह मर गयी । अब क्या था बलख शहर में हाहाकार मच गया । शोकने आकर समस्त नगर में निवास किया । यदि उस समयके शोकने शोका वर्णन लिखने लग जाऊं तो एक दूसरी और बड़ी पुस्तक बन जाये इस कारण संक्षेपमें लिखना यह है कि, बादशाहको सिवाय इस शाहजादीके दूसरी संतान न होने के कारण सर्वत्र शोकही शोक फैल गया । संक्षेपतः यह कि शाहजादी की मृतकको लेकर कब्रकी अन्तिम किया करके सब लोग लौटकर चले आये ।

इधर अह्मशाहकी आयुशेष रहनेके कारण सदगुरुकी कृपासे दिनभर अचेत पड़े रहनेके पश्चात् दोघड़ी दिन रहते वह सचेत हुए सचेत होते ही शिर उठाकर देखा तो जंगलके सिवाय कुछ नहीं दीख पड़ा न तो शाही महल है, न वजीर काद्वार, न उनके मोती । इस प्रकारसे चारों ओर शून्यही शून्य देख कर अह्मशाह प्रथम तो आश्चर्यमें आये किन्तु उनका आश्चर्य जाता रहा और इशकका जोश फिर अन्तःकरणमें उठा फिर तो अह्मशाह सीधा शहरको पहुँचे । शहरमें पहुँचकर उनने चारों ओर शोक फैला हुआ देखकर जिससे पूछते वही कहता कि, शाहजादी मर गयी प्रथम तो उन्हें लोगोंके कहने का विश्वास नहीं हुआ किन्तु जब शाही महलके द्वारपर पहुँचे और वहाँ भी लोगोंको शोकमें विकल देखा और चारों ओरसे हाय ! हाय ! की ध्वनि सुनी तब उन्हें विश्वास हुआ कि, सचमुच शाहजादीका परलोकवास हो गया । इस बातके निश्चय होतेही उनके हृदयपर