कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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मुलतानबोध
ऐसा आघात लगा कि, जहाँ खड़े थे वहाँ ही वह अचेत होकर गिर गये और उसी अवस्थामें उस समय तक पड़े रहे जब तक बादशाह शाहजादी की अंतिम किया करके कब्रस्थानसे फिर कर आये। बादशाहके कबरसे लौटकर एकबार फिर भी रोने पीटने और हाथ बोय करनेकी वह धूम मची कि जिसका वर्णन करना कठिन है। उसी हाथ बोय शोककी चिल्लाहटमें अह्मशाहको चेत आया चेत आतेही उस समयकी सभा देखकर पागल विशिप्त चित्तके समान होकर वहाँसे वह चल पड़े। एक तो अंगेरी रात दूसरे शोकसे कातर अह्मशाह आधीरात तक तो जंगलमें इधर उधर भटकते औ ठोकर खाते रहे किन्तु आधीरातके पश्चात् प्रभु कृपासे भटकते २ शाही कब्रस्थानके निकट पहुँच गये। वहाँ जानेपर उनके हृदयको कुछ घैर्यसा हुआ और कुछ चेतना भी आयी फिर तो एक वृक्षकी आडमें खड़े होकर उन्होंने कब्रके रक्षकोंको ध्यान पूर्वक देखना आरंभ किया। संयोगवश दिनभरके थके हुए पहले वाले ऐसी निद्रामें अचेत हुए कि, उन्हें किसी बातकी सुधि न रही। पहलेवालोंको बेसुध देखकर इश्ककी तरंगमें एक ओरसे कनात फाड़ दिया और अन्दर पहुँचकर वह चोरोंके समान धीरे धीरे कबरतक पहुँचे। कब्रके निकट पहुँच कर वह प्रथम तो कब्रसे लपटकर थोड़ी देरके लिये अचेत होगये फिर चेत आनेपर उन्हें यह विचार आया कि, एकबार माशूकका दीदार कर लेना चाहिये। दीपक तो चारोंओर जलही रहे थे उसी प्रकाशमें उन्होंने कबरकी मिट्टी अलग करके ताबूतसे शाहजादीकी मृतक को बाहर निकाला और दीपकके सामने उसे लिटाकर उसके मुखको एकटक देखने लगे। देखते देखते उनके हृदयमें ऐसा तरंग उठा कि इसे अपने पर्णकुटीतक