भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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लेजाना चाहिये । बस । फिर क्या था कब्रकी मिट्टीको ज्योंका त्यों करके वह शाहजादीकी लाश उठाकर अपनी कुटीपर पहुँचे सद्गुरुकी ऐसी कृपा हुई कि, जबतक यह अपनी कुटीतक नहीं पहुंच गये तबतक किसी पहरेदारने करवट भी नहीं ली । अद्दमशाहने अपनी कुटीमें शाहजादी की लाशको दीवारके सहारे बैठा दिया और जंगली लकड़ियोंको जलाकर उसीके प्रकाशमें उस मृतकको सम्बोधन करके कहने लगा ।

होगयी आतश जब वहां शोआले जन । बैठा उसके हूबहू यह खिस्तःतन ॥ रोशनीमें आगके वह नीमजाँ । देखता था हुस्न हूए दिलस्ताँ ॥ बादिले पुरदई चश्मे अशकबार । देखता था उस परीरू की बहार ॥ गोरे तनपर वह उसके पैठा कफन । जामये शबनभमें गोया यासमन ॥ चिहरेका आलम कफनमें जो कि था । बिद कबदे चांदनीमें वह मजा ॥ करके उसकी लाशको अद्दम खिताब । यों लगा कहने जेराहे इजतराब ॥ ऐबुते संगीं दिले ना आशना । क्यों क्या मुझको बलामें मुबतिला ? ॥ क्योंकि दिखाकर दफतन अपनी फबन । रंजमें डाला था ऐ नाजुक बदन ॥ दई व गममें अपन करक मुबतला । एक मुदत तक मुझे रूसवा कि किया ॥