भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 816, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 816

( ७६ )

मुलतानबोध

मुझमें क्यों चाहेथी वह नादिर गोहर । दो बरसतक क्यों रखाथा बहू पर ॥ अहद गर तुझको वफा करना न था । मुझको जिन्दःछोडकर मरना न था ॥ तुझमें कुछ बूए वफादारी नहीं । यार होकर शवये यारी नहीं ॥ तुझको गर दुनियाँसे करना था सफर । साथ लेना था मुझको ऐ सीम्बर ॥ रुह तेरी बाद जन्नतको गयी । देगयी इस रक्त जाँको बेकली ॥ हालकी मेरी खबर भी है तुझे । कल नहीं पड़ती किसी करवट मुझे ॥ बाग जन्नतमें किया तूने वतन । मैं रहा बहरे अलम में गोते जन ॥ हैफ है सद हैफ दीदारे हबीब । बाद मरनेके हुआ मुझको नसीब ॥ वाह ऐ चर्ख सितमगर वाहवाः । तूने जालिम क्या सितम मुझपर किया ॥ जीस्त में माना रहा दीदार से । बाद मरनेके मिलाया यारसे ॥ देखलेती यह भी मेरी बेकली । जोबर आती सब तमन्नाये दिली ॥ इसको भी शायद था कुछ मेरा कलक । हो गयी जो दमके दम में जांबहक ॥ खागयी इसको गमँ पिनहानः इश्क ।