कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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मुलतानबोध
साहिबका कृपासागर लहराया । फिर क्या देर थी सब सामग्री इकट्ठी हो गयी । अर्थात् ।
भूलकर ज़ुल्मत से रहको कारवाँ । कुदरते हकसे वहाँ वादिदहुआ॥ अंधेरी रात के कारण कोई व्यापारी काफला राह भूल कर उसी बन में आकर उतरा । जाडेकी ऋतुके कारण जब काफलेके आदमी आगकी खोज करने लगे तब दूरसे आगके प्रकाश को देखकर एक आदमी अद्दमशाहकी कुटीपर भी पहुँचा । कारवाँमेंसे कोई मरदे खुदा । देखकर बनमें उजाला आगका ॥ दिलमें अपने पुरतः करके गुमाँ । खानए दुर्वैश है शायद यहाँ । आग लेने को वहाँ आया चला । ताकरे वह अपनी कुछ हाजतरवा॥ मुतसिलहुजरेके जब पहुँचा वह मर्द । रंग अद्दमका हुआ दहशतसे जर्द॥
उसकी आहट पाकर अद्दम तो मारे डरके घबरा गये और कुटीके कोनेमें बने हुए गुफामें छिप गये । इधर तो यह हुआ, उधर वह आदमी जब कुटीमें आया तो भीतरके दृश्यको देखकर एकदम घबरा गया । अद्दमशाहने समझा था कि, कबरके रक्षकोंको सब हाल मालूम होगया है इससे उन्हींमेंसे कोई मुझे पकड़ने आया है और उस आदमीको मालूम हुआ कि, न जाने यह क्या चला है कि, शून्यसान घरमें कफनसे ढकी हुई मृतक देह बैठी हुई है और सामने आग जल रही है किसी जीवित पुरुष का पता नहीं है । वह अपने मनही मन बहुत डर गया और पिछले पाँव फिरकर अपनी मंडलीमें गया । वहाँ जाकर उसने अपने सरदारको सब देखी हुई बातें एक एक करके सुनायीं जिसको सुनकर लोग बड़े आश्चर्यमें आये । कुछ देरतक शोच विचार करके मण्डलीके सरदारने काफलेके साथके वैद्य और अन्य कई मनुष्योंको साथ लेकर अद्दमशाहकी कुटीपर जाने-