भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ७९ )

का विचार किया । और प्रथम मनुष्यको जो वह सब दृश्य देखकर आया था आगे करके कुटीपर जा पहुंचा ॥

थाक जाय कार उनमें एक तबीब । हाजिरको दाना बहुशियारो लबीब ॥ लेके साथ उसको अमीरे कारवाँ । सुनतेही इस बातके पहुंचा वहाँ ॥

थी जहां रौनक फिजा वह दूरजाद ॥

पहुंचे यह दोनों वहां मानिन्द बाद ॥

बे तअमुलबेतव कुफ केदवाँ । यह गयेवहरोशनथी आतशजहाँ ॥ जाके देख फिर हकीकत है वही । जिसतरहकहता था वहमरदेरही ॥ देखकर उस हालको शुसदर रहे । लबगुजाँ हैरत जदा मुजतररहे ॥ आइनेसाँ शक्क जब आयी नजर । होगये हैरान दोनों देख कर ॥ बोला आखिर वह हकीमें नुकतेदाँ । रंगमें सुदँके यह रौनक कहाँ ॥ वहां जाकर उन्होंने सब दृश्य वैसेही ठीक ठीक देखा जैसा उप- र्युक्त मनुष्य ने कहा था । प्रथम तो वैद्य सहित वह व्यापारी आश्चर्यमें आया किन्तु थोड़ी देर तक शाहजादीकी ओर ध्यान पूर्वक देखनेपर वैद्यने जब कहा कि, यह औरत मरी नहीं किंतु सकते के रोग से ग्रसित हो अचेत होगयी है तब तो उपरोक्त ( काफलेके ) सर्दार और भी अधिक आश्चर्य में आया उसने वैद्य से कहा क्या यह ( शाहजादी ) अच्छी भी हो सकती है ? वैद्य ने उत्तर दिया अभी अच्छा करता हूँ ! पश्चात् वैद्यने अपने पाससे नशतर निकाल कर शाहजादीके हाथ की रग को नशतर से छेदा जिससे रक्त बहने लगा । थोड़ी देर तक लोहू निकलता रहा और जब दूषित रक्त शरीरसे निकल गया तब शाहजादी सचेत हो गयी ।

सचेत होतेही शाहजादीने जैसेही आँख खोली अपने सामने दो अपरिचित मनुष्योंको खड़े देखकर लज्जा और आश्चर्यमें