कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 826, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८६ )
सुल्तानबोध
के अनुसार विवाहके लिये दो साक्षीकी आवश्यकता है सो तुम दोनों हमारे विवाहके साक्षी हो जाओ जिसमें लोक परलोकमें हम पापके भागी न होंवे तब मैं विवाहको स्वीकार करूँगी । उन दोनोंने शाहजादीके बचनको मानकर साक्षी बनना स्वीकार किया और दोनोंकी गांठ जोड़ ( पाणिग्रहण ) करा दिया । पश्चात् वे दोनों तो अपने कारवानमें चले गये और अह्मशाह शाहजादीको पाकर परम आनन्दित हो अपनी पर्णकुटीमें बास करने लगे ॥
दोनोंमें परस्पर ऐसा प्रेम हुआ कि, कोई किसीके वियोग को क्षणमात्र के लिये भी सह नहीं सकता था । जड़लके फल फूल पत्ते और कन्द मूलपर वे अपना दिन बिताते और स्वर्गसे भी बढ़के आनन्दको मनाते थे ॥
कुछ दिनोंके पश्चात् शाहजादी गर्भवती हुयी और समय पूरा होनेपर परम सुन्दर पुत्रको प्रसव किया । उसी पुत्रका नाम अह्म शाहने इब्राहीम रक्खा । किताबोंमें लिखा है कि, अह्मशाहके संग के प्रतापसे शाहजादी भी सर्वशुभ गुणोंसे सम्पन्न महान् तपस्विनी और भजनानन्दी होगयी थी । जिस समय उसे गर्भ स्थित हुआ था उस समय समस्त बन नाना प्रकारके फल फूल और मेवोंसे सम्पन्न हो गया था । सदा वसन्त ऋतुकाही आनन्द वहाँ दीखने लग गया था । नाना प्रकारके पशु पक्षियों ने आकर वहाँ बास किया था । जिससे वह बन कानन बनकर स्वर्गके समान सुख-दाई हो रहा था । इब्राहीमके जन्म लेनेपर उनकी आकृति सम्पूर्ण रूपसे हजरत इब्राहीम खली लुछासे मिलती थी इसी कारणसे उनका भी नाम इब्राहीम रक्खा । जिस समय शाह-इब्राहीम का जन्म हुआ वह एक सो एकसठ ( १६१ ) हिजरी थी।